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Thursday, 27 April 2017

शीशे का बना हुआ अब मेरा मकान नहीं है..





सूरज को बड़प्पन का अभी ज्ञान नहीं है, 
दीये को ऊँचे कद की कुछ पहचान नहीं है..

जितनी उचाई पर देख रहा है आज वो खुद को, 
उतनी ऊँची उस परिंदे की उड़ान नहीं है..

वो बड़ा ही क्या जो किसी के काम ना आए, 
खजूर बड़ा है फिर भी उसकी शान नहीं है.. 

वक़्त आने पर अपनी इच्छाओ की भी आहुति दे दे,
इससे बढ़कर इस दुनिया में कोई बलिदान नहीं है..  

छलक छलक जाती है आधी भरी हुई गागर, 
भरे हुए मटके को खुद पर अभिमान नहीं है.. 

डाल रखा है चेहरे पर मासूमियत का नक़ाब, 
दिखता नादान है वो, पर इतना भी नादान नहीं है.. 

एक न एक दिन कहीं ढ़ूँढ़ ही लेंगे तुझे ए मंज़िल,
 खा भी ना सके ये ठोकरें, हम वो इंसान नहीं हैं..

अपनी इस दुनिया में ही अटका रहता है मेरा मन, 
इंसान हूँ भाई, किसी तोते में मेरी जान नहीं है..

सूना है, अंधेरो में भी डरता है वो अपने घर जाने में,
उस ज़िल्लत के साथ जीने वाला कोई महान नहीं है.. 

अमृत त्याग कर विष धारण करना होता है यहां,
इस ज़माने में शिव बनना उतना आसान नहीं है.. 

क़ुबूल करता है आजकल पत्थर के तोहफे भी सुमीत, 
शीशे का बना हुआ अब मेरा मकान नहीं है.. 



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