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Monday, 14 October 2013

ज़ख्म यादों के परों से दिल में उतर जाते हैं





कुछ उग चुके कांटे, जब मुझे बहुत तड़पाते हैं,
पलकों के ठिकाने पे, अपने दर्द को पहुंचाते हैं।
मैं तब यह राज़ जान कर, ठगा सा रह जाता हूँ,
ज़ख्म यादों के परों से दिल में उतर जाते हैं ।


कभी यादें मंझधार, कभी खुद किनारा होती हैं,
राह में गिराती हैं, कभी सबका सहारा होती हैं ।
मैं आईने में खुद को, जब सीधा खडा देखता हूँ,
सारे अक्स, मेरे यादों की हवा से लड़खड़ाते हैं ।
ज़ख्म यादों के परों से दिल में उतर जाते हैं ।


यादें साज़ भी हैं, यादें ही संगीत, सुर औ राग हैं,
यादें नज़रों का नूर भी है, और चहरे के भी दाग हैं ।
मैं जब जानना चाहूँ इनको, ये कुछ और हो जाती हैं,
मेरे सारे सपने कैसे इस सागर में घुल जाते हैं ।
ज़ख्म यादों के परों से दिल में उतर जाते हैं ।


21 comments:

  1. waqt bhi chal raha hai usi raftar se....
    Mere zindagi mein sab kuch thehra kyo hai?

    Gile shikwe ruk jaate hai hotho tak aake.
    Har lafz pe khamoshi ka pehra kyo hai?

    Dil kehta hai mohabbat nahi khata hai ye...
    Phir dil ki deewar pe uska chehra kyo hai?

    Aur bhi zakham hai uske zakhmo ke siva...
    uske hi zakhm ka daag etna gehra kyo hai?????

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  2. sir sach me aapko padh ke aur aapki speech dene ki jo theory hai us se aadmi khud ko connect hone se nhi rok pata hai na cahte hue bhi aapke es post ko padhte padhte dil ko bahut gahre tak chhu gya, ye feeling jab bhi kumar vishwas ka poem sunta hu tab bhi aa jaata hai..

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  3. कोई भला इतनी सादगी से हर बात कैसे कह सकता है। ये कोई आपसे सीखे।

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  4. Anjaam-e-mohabbat kisi ko bataya nahi karte.....
    yeh ashq har kisi ke liye bahaya nahi karte.......
    log mutthi bhar namak liye chaltein haiii...........
    dil ke zakhm har kisi ko dikhaya nahi karte..............

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  5. Daraya zindgi ne iskadar mujko
    Ki chand khushyo ka pata hi na laga.

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  6. Raste kahan katam hote hai zaindgi ke safar me
    Manjil to wohi hai jahan khwaishain tham jayee

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  9. Na hi raaste khatam hue,
    Na hi Manzile mili,
    Bas issi terah zindagi ke kai saal gujar gaye.......!!

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