हमें इ-मेल द्वारा फोल्लोव करें! और हज़ारो लोगो की तरह आप भी इस ब्लॉग को सीधे इ-मेल द्वारा पढ़े!

Saturday, 26 October 2013

ऐसी तो कभी कोई कहानी नहीं होती




 कुछ यादें ऐसी होती है, जो ज़रा भी सुहानी नहीं होती।
और उसपे सितम ये है की, वो चाहकर भी भुलानी नहीं होती।।

लगता है की ये कलियाँ, बाघबान में खुद ही हैं उजड़ी।
सुना है की अब भवरों को भी, फूलों की चाहत नहीं होती।।

मौसम के बदलने से, अक्सर बदल जाता है मंज़र।
दुनिया में कोई भी चीज़, मेरे दोस्त पुरानी नहीं होती।।

वैसे उसको भी हुनर आ गया है, आँखों से देखने का।
और आजकल तो हमसे भी कोई बात, ज़बानी नहीं होती।।

कभी कभी हम भी कुछ बातें छुपा लेते हैं उनसे अक्सर।
क्यूंकि तारीफ़ के पहलु में यारा, कभी शिकायत नहीं होती।।

यूँ तो रफ़्तार न मिलती कभी, इस कश्ती को हमारी।
इन जज्बातों के दरिया में अगर, इतनी रवानी नहीं होती।।

ये सिर्फ आगाज़ है इस सफ़र का, इसका मगर अंजाम नहीं है।
दुनिया कह रही है की, सुमीत ऐसी तो कभी कोई कहानी नहीं होती।।

Friday, 25 October 2013

शहादत पर सियासत का खेल

मौत का दुख सबको होता है.. अपनों की मौत पर हर कोई रोता है.. लेकिन आंसुओ का मौल सियासत तो नहीं होता है.. इंदिरा जी ने जान गवाई, लेकिन उनकी मौत की सज़ा पूरी एक कौम ने पायी.. पता नहीं कितने घरो में मातम पसरा.. पता नहीं कितनी बेदर्दी से लोगो का दम निकला.. किसी को जिंदा आग में फूंक डाला तो किसी को तलवार से काट डाला.. वो तो अपनों की मौत का मातम भी नहीं मना पाए.. उन्होंने पता नहीं कितने साल अपने उजड़े घरो को बसाने में लगाए.. वो एक जूनून था, जिसमें केवल खून था.. गुस्ताखी एक सरफिरे की थी, लेकिन सज़ा पता नहीं कितनो ने पायी।।



आपने उस दर्द की कहानी सुनाई, लेकिन ज़ख्मो को हरा करने से सूख नहीं मिलता, बल्कि दर्द बढ़ता है, वो चाहे आपको हो या औरो को.. राजीव जी हत्या भी वेह्शियत की उपज थी, लेकिन उनकी मौत की भावुकता में हमने वही गलती दोहराई, जो हमने राजीव जी के जीवन से अपनाई.. राजीव जी को सत्ता से हटाना देश की भूल थी, लेकिन नरसिम्हा राव को प्रधानमंत्री बनाना आपकी चूक थी..
हम जज़्बात से सोचते हैं, इसीलिए हमेशा रोते हैं.. हम वीपी सिंह की साजिशों का शिकार नहीं हुए होते और राजीव सत्ता में रहते तो यह देश शिखर पर होता.. लेकिन उनकी मौत के बाद सोनिया जी ने साहस नहीं दिखाया और राव को प्रधानमंत्री बनाकर देश को मिटाया।।
आज आप फिर से सत्ता मांगते हैं, लेकिन आप अपने नेताओं के गिरेबां में नहीं झांकते हैं.. जब ज़िम्मेदारी का मौका आता है तो आप पीछे हट जाते हैं और मनमोहन जैसे नौकरशाहों को देश थमाते हैं.. जो विदेशियों के हाथों बिक कर देश में महंगाई बढाते हैं.. कॉर्पोरेट जगत के हाथो देशवासियों को लुटवाते हैं.. कभी शेयर बाज़ार में तो कभी वायदा बाज़ार में हम उजड़ जाते हैं, अमीर और अमीर और गरीब भिखारी बनकर ज़िन्दगी बिताते हैं.. राजीव जी और इंदिरा जी तो गद्दारों के हाथो मारे जाते हैं, लेकिन हम तो हर दिन मौत से बदतर ज़िन्दगी बिताते हैं.. आप शहादत पर सियासत का खेल मत खेलिए, वरना हम अपनों की मौत के आंकड़े बताएँगे तो आप गिनती नहीं लगा पाएंगे.. आपके अपने तो शहीद कहलाते हैं, हर पुण्यतिथि पर हम खुद भी आंसू बहाते हैं, लेकिन सच मानिए जब हमारे अपने कभी सडको की दुर्घटनाओं में तो कभी आतंक की बलि चढ़ जाते हैं तो एक दिन की खबर बनकर रह जाते हैं, उनके घर उजड़ जाते हैं, उनके परिवार बिखर जाते हैं, उनका कोई सहारा नहीं बचता है.. सच बताये तो उन्हें मातम का भी वक़्त नहीं मिलता है, इसीलिए आंसुओं का हिसाब मत मांगिये, दर्द की सियासत का हिस्सा मत बनिए।।
अगर आप ईमानदार हैं, तो अपनी इमानदारी इमानदारी दिखाइए.. सच कहने के साहस का विश्वास दिलाइये.. जिस तरह आपने दागी सांसदों का अध्यादेश फाड़ा था वैसे तेवर दिखाईये.. और इस देश को शिखर तक पहुचाने की कसमे खाईये, जो सोचते हैं वो कर के दिखाईये.. अपनों से लड़ने का जौहर जिस तरह आपने दिखाया उसको आधार बनाईये.. पहले कांग्रेस की गन्दगी मिटाइये फिर जनता को आजमाईये.. फिर सत्ता आप इस तरह पाएंगे की अंगद की तरह डटे नज़र आयेंगे।। 

Wednesday, 23 October 2013

ज़िन्दगी की दुकान पर हम सबकी उधारी है




ज़िन्दगी की दुकान पर हम सबकी उधारी है,
चलती हुई सांसो का उधार, बहुत भारी है॥

ज़िन्दगी है कभी बहार, तो कभी पतझङ भी है,
कभी फूल की पत्ती है, तो कभी चिँगारी है॥

हमेशा खुद की ही राहों में, ज़िन्दगी गुजारी है,
अब तो धुप भी हमारी है, छाव भी हमारी है॥

इन मासूम और सीधे चहरो पर, ऐतबार मत करना,
शहर में सियासत के, कुछ दोस्त भी शिकारी हैं॥

बाप बोझ ढोता था, क्या दहेज़ दे पता बेचारा,
इसी लिए ही वो शहज़ादी आज तक कुंवारी है॥

मोड़ लेने वाली है, ज़िन्दगी कोई शायद,
अब के फिर इन हवाओं में, एक बेक़रारी है॥

वक्त की धूप मेँ ओढ़ाती है जब अपना आँचल,
ज़िन्दगी अपनी माँ की तरह लगती, प्यारी है॥

ज़िन्दगी की दुकान पर हम सबकी उधारी है,
चलती हुई सांसो का उधार, बहुत भारी है॥

Tuesday, 22 October 2013

खाली हाथ शाम आई है



में हमेशा बचता हु अपने ब्लॉग पर ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करने से जो मुझे या मेरे पाठको को demotivate करे, पर अपनी एक मित्र के ब्लॉग से याद आये गीत को जब कल रात काफी समय बाद वापस सुना, तो उसके शब्दों का शायद जादू ही था जो आप सब के बीच वो गीत शेयर करने का मन हुआ.. 
गीत है गुलज़ार साहब का लिखा और आशा भोसले का गाया, इजाज़त (१९८८) फिल्म का, खाली हाथ शाम आई है, खाली हाथ जाएगी.. 
गीत में लेखक ने अधूरेपन, दुःख, दर्द और इंतज़ार को बड़ी सहजता और सरलता से बयां किया है, उस वक़्त मेरे आस पास का शांत माहोल भी  मेरा पूर्ण सहयोग कर रहा था, उस गीत में खो जाने के लिए.. 
वाकई खुबसूरत, एक बार ज़रूर सुनिये।।





खाली हाथ शाम आई है, खाली हाथ जाएगी।
आज भी ना आया कोई,
आज भी ना आया कोई, खाली लौट जाएगी।
खाली हाथ शाम आई है, खाली हाथ जाएगी।
खाली हाथ शाम आई है।। 


आज भी ना आये आंसू,
आज भी न भीगे नैना,
आज भी ना आये आंसू,
आज भी न भीगे नैना,
आज भी ये कोरी रैना, कोरी लौट जाएगी।
खाली हाथ शाम आई है, खाली हाथ जाएगी।
खाली हाथ शाम आई है।। 


रात की स्याही कोई,
आये तो मिटाए ना,
रात की स्याही कोई,
आये तो मिटाए ना,
आज ना मिटाए तो ये, कल भी लौट आएगी।


खाली हाथ शाम आई है, खाली हाथ जाएगी।
खाली हाथ शाम आई है।। 
आज भी ना आया कोई, खाली लौट जाएगी।
खाली हाथ शाम आई है, खाली हाथ जाएगी।
खाली हाथ शाम आई है।।

Saturday, 19 October 2013

प्यार तो खुद आपके पास भी बहुत है

कुछ लोगो को प्यार के पीछे भागते देखा है हमने कई बार, पर मेरा मानना है की उन लोगो को तो प्यार का एहसास तक नहीं है, तब ही तो वो उसके पीछे भाग रहा है! दुनिया की इस दौड़ धुप में हर आदमी कुछ न कुछ चाहता है, हर दम किसी को ढूँढना और पाना चाहता है। हर दिल में यही ख्वाहिश होती है की कोई हो जो उसे बहुत ज्यादा प्यार करे, उसका हर दम ख्याल रखे, उसकी भावनाओं को समझे।।



पर दोस्तों, हम हमेशा ऐसा ही क्यों चाहते है "की कोई ऐसा हो..." हम हरदम किसी में अपना हमदम क्यों ढूँढ़ते हैं..? पर शायद हम इसी में गलती करते हैं, जो हम हमेशा अपना प्यार दुसरो में ढूँढ़ते हैं। बचपन में जब मुझे प्यार का एहसास नहीं था तब में हमेशा सोचता की अगर भगवन ने हमें दिल दिया है तो वो दीखता क्यों नहीं? और अगर विज्ञान कहता है की दिल एक इंजन है जिस से हम जीते हैं। तो आशिक हमेशा दिल टूटने पर रोते क्यूँ हैं?
अरे भाई, ज़िन्दा हो इसका मतलब है की दिल टूटा नहीं है.. सिर्फ ज़ख़्मी हुआ है..! है ना..?

खैर, हम हमेशा अपने दुखों को जितना चाहे उतना बढ़ा सकते हैं.. क्योंकि किसको कितनी ज्यादा अहमियत देनी है हम अच्छी तरह से जानते हैं.. में सिर्फ इतना कहना चाहता हूँ की बचपन से जवानी तक, जवानी से बुढ़ापे तक हम हमेशा किसी न किसी चीज़ की डिमांड ही करते हैं, कभी पैसे की, कभी सुख-सुविधाओं की, कभी  शांति की, तो कभी प्यार की.. हम डिमांड बहुत ज्यादा करते हैं पर सप्लाई बहुत कम।। 

हमें प्यार बेशुमार चाहिए पर उसे पाने की और निभाने की क्षमता बहुत कम। जब हम चाहते हैं की हमें बहुत प्यार करने वाला जीवनसाथी चाहिए, तब हम ये क्यूँ भूल जाते हैं की सामने वाला व्यक्ति भी हमसे वही चाहता है, इसीलिए तो पास आया है। ऐसे तो दो व्यक्ति हमेशा एक दुसरे को आजमाते रहेंगे, और एक दुसरे की अपेक्षा में खरे नहीं उतर पाएंगे! क्यूंकि हम चाहते हैं की "हमें प्यार मिले"… "कोई मेरा हो जाये"… पर ये नहीं सोचते की में किसी का हो जाऊ। सच्चा प्यार हमेशा निस्वार्थ होता है, प्यार किसी को पाना नहीं, पर खुद उसमे खो जाना है…  प्यार वो है की कोई इसीलिए जीता है "क्योंकि मेरा हमदम है…!"

हमें प्यार की तलाश करने की कोई ज़रूरत नहीं, क्यूंकि हमें सच्चे प्यार की बहुत कम समझ है। क्यूंकि जब तक हम तलाश करते हैं, किसी का प्यार हाथ से छुट जाता है। और जब तलाश ख़त्म होती है तब तक वो वक़्त और मौका हाथ से निकल चूका होता है.. बस दोस्तों दिल में इतना प्यार रखिये की अगर आप वो किसी को भी दे तो वो एक पल भी आपके बिना जी ना पाए… 
सनम हो न हो, प्यार मिले न मिले, उसे बाटना चहिये… दुनिया में बहुत से रिश्ते हैं, जो शायद हमें प्यार करने के लिए ही मिले हैं। भगवान् ने सिर्फ हमें दो चीज़े दी हैं, एक है वक़्त और एक है प्यार! दोस्तों अगर प्यार खोजते रहोगे तो वक़्त निकल जायेगा और अगर सच्चे प्यार को खो दोगे तो वक़्त तुम्हे हराएगा! जो रिश्ते हमारे पास हैं अगर हम उन्ही में अपना प्यार नहीं बाट सकते तो किसी नए को क्या देंगे।।

Love yourself, Love everyone……
Who knows love when enter your life……..!

वक़्त का सदुपयोग करो, अपना करियर बनाओ… और रही प्यार की बात तो वो आपके पास ही है! ये वो कस्तूरी है जिसके पीछे हर मृग दीवाना है, हर दम उसे ढूँढता है पर भूल जाता है की वो तो खुद में इतनी भरी पढ़ी है की अगर तुम उसे न दो तो खुद पागल हो जाओगे इस खोज में.… 
आप पागल मत बनिए बल्कि खुद में झाकिये, प्यार आपके पास बहुत है.. ज़रूरत है तो सिर्फ उसे महसूस करने की और बाटने कि… 


Do not run through life so fast that you forget not only where you have been,
but
Also where you are going...
Life is not a race,
but
A journey to be savored each step of the way...

Monday, 14 October 2013

ज़ख्म यादों के परों से दिल में उतर जाते हैं





कुछ उग चुके कांटे, जब मुझे बहुत तड़पाते हैं,
पलकों के ठिकाने पे, अपने दर्द को पहुंचाते हैं।
मैं तब यह राज़ जान कर, ठगा सा रह जाता हूँ,
ज़ख्म यादों के परों से दिल में उतर जाते हैं ।


कभी यादें मंझधार, कभी खुद किनारा होती हैं,
राह में गिराती हैं, कभी सबका सहारा होती हैं ।
मैं आईने में खुद को, जब सीधा खडा देखता हूँ,
सारे अक्स, मेरे यादों की हवा से लड़खड़ाते हैं ।
ज़ख्म यादों के परों से दिल में उतर जाते हैं ।


यादें साज़ भी हैं, यादें ही संगीत, सुर औ राग हैं,
यादें नज़रों का नूर भी है, और चहरे के भी दाग हैं ।
मैं जब जानना चाहूँ इनको, ये कुछ और हो जाती हैं,
मेरे सारे सपने कैसे इस सागर में घुल जाते हैं ।
ज़ख्म यादों के परों से दिल में उतर जाते हैं ।


Sunday, 13 October 2013

ज़माने का ज़हर



शीशे का जो मेरा घर नहीं होता,
किसी के हाथ में पत्थर नहीं होता।।

कौन बताये हुस्न बड़ा है या इश्क,
सामना कभी खुल कर नहीं होता।।

पाया है भला किस ने दिल का पता,
खाना-बदोशो का कोई घर नहीं होता।।

कभी एक नज़र में हो जाता है प्यार,
कभी हमसफर के साथ सफ़र नहीं होता।।

मोहब्बत से बनता है कोई घर, घर,
इंट-पत्थर से बना घर, घर नहीं होता।।

इस भरम में बेचारे लोग मारे गए,
फूल के हाथो में खंजर नहीं होता।।


पीना पढता है यहाँ ज़माने का ज़हर,
नाम से "सुमीत" कोई शंकर नहीं होता।।



Saturday, 12 October 2013

ज्ञान और अज्ञान के बीच

आज जब कुछ लोगो के बीच बैठ कर उनकी बातें सुन रहा था, वहाँ वो सब किसी शख्स की बुराई कर रहे थे.. 
सभी के अपने-अपने मत थे वहाँ.. आखिर सब एक से बढ़ कर एक ज्ञानी जो थे.… कोई कह रहा था की वो शख्स ऐसा है, कोई कह रहा था की वो शख्स वैसा है.. सभी के अपने अपने विचार थे जो उन्होंने अलग अलग पहलुओ को देख कर बनाये थे। 
 में उन लोगो की बातें सुन कर बस यही सोच रहा थे की हम किसी के बारे में कुछ कहने, सोचने या निर्णय लेने वाले होते कौन है। किसने दिया हमें इतना हक़…। और सब से ज़रूरी बात तो ये की हमें इस से मिल क्या रहा है?
सत्‍य के संबंध में विवाद सुनता हूं, तो आश्चर्य होता है। निश्चय ही जो विवाद में हैं, वे अज्ञान में होंगे। क्योंकि, ज्ञान तो निर्विवाद है। ज्ञान का कोई पक्ष नहीं है। सभी पक्ष अज्ञान के हैं। ज्ञान तो निष्पक्ष है। फिर, जो विवादग्रस्त विचारधाराओं और पक्षपातों में पड़ जाते हैं, वे स्वयं अपने ही हाथों सत्य के और स्वयं के बीच दीवारें खड़ी कर लेते हैं। मेरा यही मानना है की: विचारों को छोड़ों निर्विचार हो रहो। पक्षों को छोड़ो और निष्पक्ष हो जाओ। क्योंकि, इसी भांति वह प्रकाश उपलब्ध होता है, जो कि सत्य को उद्घाटित करता है।


एक पुराना लेख याद आता है जब एक अंधकार पूर्ण गृह में एक बिलकुल नए और अपरिचित जानवर को लाया गया। उसे देखने को बहुत से लोग उस अंधेरे में जा रहे थे। चूंकि घने अंधकार के कारण आंखों से देखना संभव न था, इसलिए प्रत्येक उसे हाथों से स्पर्श करके ही देख रहा था। एक व्यक्ति ने कहा- राजमहल के खंभों की भांति है, यह जानवर। दूसरे ने कहा- नहीं, एक बड़े पंखे की भांति हैं। तीसरे ने कुछ कहा और चौथे ने कुछ और। वहां जितने व्यक्ति थे, उतने ही मत भी हो गये। उनमें तीव्र विवाद और विरोध हो गया। सत्य तो एक था। लेकिन, मत अनेक थे। उस अंधकार में एक हाथी बंधा हुआ था। प्रत्येक ने उसके जिस अंग को स्पर्श किया, उसे ही वह सत्य मान रहा था। काश! उनमें से प्रत्येक के हाथ में एक-एक दिया रहा होता, तो न कोई विवाद पैदा होता, न कोई विरोध ही! उनकी कठिनाई क्या थी? प्रकाश का अभाव ही उनकी कठिनाई थी। वही कठिनाई हम सबकी भी है। जीवन सत्य को आतंरिक प्रकाश में ही जाना जा सकता है। जो विचार से उसका स्पर्श करते हें, वे निर्विवाद सत्य को नहीं, मात्र विवादग्रस्त मतों को ही उपलब्ध हो पाते है।
सत्य को जानना है, तो सिद्धांतों को नहीं, प्रकाश को खोजना आवश्यक है। प्रश्न विचारों का नहीं, प्रकाश का ही है। और, प्रकाश प्रत्येक के भीतर है। जो व्यक्ति विचारों की आंधियों से स्वयं को मुक्त कर लेता है, वह उस चिन्मय-ज्योति को पा लेता है, जो कि सदा-सदा से उसके भीतर ही जल रही है।

Thursday, 3 October 2013

ख्वाब सुनहरे ही रहते हैं



खुशियों के मौसम उस जगह ठहरे ही रहते हैं,
उम्मीदों के पेढ़ जहाँ हमेशा हरे ही रहते हैं... 

यादों के मोती समंदर में गहरे ही रहते हैं,
कुछ जख्म ऐसे होते हैं की हरे ही रहते हैं...

कौन कह सकता है, कैसी है सूरत किसी की,
चेहरे पे लोगों के हरदम चेहरे ही रहते हैं...

अब न जाने ये दूरियाँ किस तरह कम होंगी,
हम बढ़ते हैं आगे, मगर वो ठहरे ही रहते हैं...

दर्द-ए-दिल ज़ुबान से भी हो जाए अगर ज़ाहिर,
पत्थर दिल वालों के कान हमेशा बहरे ही रहते हैं...

ज़िन्दगी चाहे लिख रही हो काजल के गीत,
ख्वाब पलकों पे हमारी "सुमित" सुनहरे ही रहते हैं... 
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...
My facebook ID:Sumit Tomar