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Saturday, 26 January 2013

हमारा गणतंत्र- न गण है न तंत्र

लोक का स्थान स्वयं ने ले लिया और तंत्र का स्थान परिवादवाद ने, बची-खुची कसर जातिवाद के तंत्र ने कर दी। बढ़ते लम्पट तंत्र एवं गिरते राजनीतिक तंत्र से कहीं न कहीं नुकसान गणतंत्र को अवश्य ही हुआ है। गुलाम भारत को स्वतंत्र कराने में जिन नेताओं ने अपनी जवानी न्यौछावर कर दी उन्हें आज के तथाकथित लोकतंत्र से ज्यादा पीड़ा है, और हो भी क्यों न ?




आज के नेता लोकतंत्र के नाम पर जो कुछ कर रहे हैं वह केवल शर्मशार ही करने वाला है, फिर बात चाहे भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने की हो, खूंखार अपराधियों जिन पर दर्जनों केस चल रहे है, बलात्कारी है, को अपना उम्मीदवार बना गणतंत्र के मंदिर में पहुंचाने का कुत्सित प्रयास ही किसी देशद्रोह से कम नहीं है। भारत की आजादी में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेने वाली, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की सेना में सम्मिलित ‘‘लोह महिला’’ के रूप में प्रख्यात केप्टन डॉ. लक्ष्मी सहगल आज के लोकतंत्र को देख दुखी है वो कहती है कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने ऐसे लोकतंत्र का सपना तो कम से कम नहीं देखा था। इसमें बदलाव आना ही चाहिए, चुनाव में प्रत्याशी ऐसे खड़े हो जो जनता के भले की सोचे, शहर के विकास की सोचे न कि अपने और अपने परिवार के विकास के लिए।
हमें देश की आजादी पर गर्व होना चाहिए क्योंकि यह आजादी बहुत कुर्बानियों के बाद मिली है। इसे केवल निःस्वार्थ की भावनाओं से ही संभाला जा सकता है। वर्तमान राजनीति पर कहती है कि आज के नेता भ्रष्ट से भ्रष्टतम होते जा रहे है ऐसे चुनावों से कोई करिश्मा नहीं हो सकता। सच्चे देशभक्त युवाओं से ‘‘लोह महिला’’ को काफी उम्मीदें है। समाजसेवी मेघा पाटकर भी कुछ ऐसी ही राय वर्तमान राजनीति को लेकर रखती है। यह सच्चा लोकतंत्र नहीं है और न ही इसकी नीतियों में लोकतांत्रिक मूल्यों की सुगंध आती है।

महात्मा गांधी, वल्लभ भाई पटेल, जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, डॉ. राधा कृष्णन, डॉ. बाबा भीमराव अम्बेडकर ने जिस गणतंत्र की बात की थी। आज तो कम से कम दूर-दूर तक नहीं दिख रहा है। जिस आदर के साथ स्वतंत्रता के बाद की पीढ़ी इनका नाम लेती है। वर्तमान परिदृश्य में आज ऐसा एक भी नेता नहीं है जिसे युवा पीढ़ी अपना आदर्श माने। जैसा कृत्य ये नेता करेंगे युवा उसी का अनुशरण करेंगे फिर युवाओं को दोष क्यों?
पांच राज्यों में चुनाव अपने पूरे शवाब पर है और ऐसे में नेता जाति, धर्म का उपयोग संविधान विरूद्ध बढ़-चढ़कर कर रहे है। ये यही नही रूकते, एक कदम आगे बढ़ सभी पार्टियों ने भ्रष्टाचारियों, बलात्कारियों, अपराधियों को अपने दलों में न केवल आदरपूर्वक जगह देते है बल्कि उनके गुणगान में संविधान में वर्णित आदर्शों को भी धता बता कह रहे है‘‘ ‘‘दर्जनों केस ही तो चल रहे है अपराध तो सिद्ध नहीं हुआ।’’ यह नियमों की निकृष्ट व्याख्या है। ‘‘क्या अपराधी और आदतन अपराधी में भेद करने की हमारे नेताओं की बुद्धि भी कुंठित हो गई है।’’
राजनीतिक पार्टियों के नेताओं के बयानवीरों, आश्वासनवीरों को तो देखिए कोई कम्प्यूटर फ्री देने की बात करता है तो कोई बिजली ऋणमाफी, आरक्षण की बात करता है। कोई इन भले मानुषों से यह तो पूछे क्या ये पैसा आपके बाप का है? जो ऊल-जलूल घोषणाएं किये जा रहे हो। निःसंदेह पैसा आम जनता का है, जनता से ही टेक्स वसूलेंगे। अन्ततः जनता ही महंगाई की बलि की बेदी पर चढ़ेगी।
हकीकत में ‘‘फ्री’’ शब्द ही असंवैधानिक है ऐसा कर हम कहीं न कहीं किसी के साथ धोखा दे रहे होते है। नेता जनता को बेवकूफ बनाने के नित नए फार्मूले ईजाद कर रहे है। नेताओं को भी अपनी जीत के लिए जनता की भावनाओं से खेलने का घिनोना खेल बंद कर सच्ची सेवा की बात करना चाहिए। जनता को इसमें कोई भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि जैसे ही पांचों राज्यों के चुनाव सम्पन्न होंगे दूसरे ही दिन पेट्रोल/डीजल की कीमतों में भारी वृद्धि कर दी जायेगी और फिर जनता को हमेशा की तरह कराहने के लिए, बिलखने के लिए उन्हें उन्हीं के हाल पर छोड़ दिया जायेगा? नाटक के लिए कुछ विपक्षीगण रैली निकाल अपनी राजनीति को चमकायेंगे।
हाल ही में जो नारी शक्ति की रक्षा के लिए जो देशभर के लोगो ने एकता का परिचय दिया वो सराहनीय था , और इसी एकता के दम पर हम गण इस तंत्र को हिल सकते हैं, तो आपस में शुभकामनाये देने की जगह वही विरोध हमारे चेहरे पर दिखना चाहिए इस तंत्र के लिए, वरना थोड़े दिन में सब भूली-बिसरी बातें बन कर रह जाती है और इस तंत्र का दुष्प्रयोग करने वाले चैन से जनता को लूटते रहते हैं।।
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