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Wednesday, 25 December 2013

ये खाली पन्ने





में नहीं जानता कि, में क्यों लिखता हूँ,
बस, ये खाली पन्ने यूँ देखे नहीं जाते,
इनसे ही अपना अकेलापन बाट लेता हूँ.. 

मेरे ख़यालो का आइना हैं ये,
मेरी अनकही बातें, मेरे अनसुने जज़्बात हैं ये.. 
इन पर जो स्याही है,
मेरे सपनो, मेरे छुपे आंसू, मेरे दर्द, मेरे प्यार कि हैं.. 

इन पर में पूरी तरह आज़ाद हूँ,
इन पर न कोई रोक है, न कोई टोक.. 

कभी भर देता हूँ इन्हे, दिए कि लौ से,
कभी बारिश कि बूंदो से,
कभी बचपन कि यादों से,
कभी उस हसींन कि तारीफों से.. 

ये पन्ने कुछ जवाब नहीं देते,
बस सुन लेते हैं मेरी बात,
क़ैद कर लेते हैं खुद में,
"मेरी दुनिया, मेरे जज़्बात"

किसी से कहते नहीं, किसी को बताते नहीं,
बस सम्भाल कर रखते हैं मेरी अमानत को,
मेरी कहानियों को, मेरी रवानियों को,
मेरी बातों को.. 

ये सही-गलत का भेद नहीं करते,
न अच्छे का, न बुरे का
इन पर न कुछ झूठ है, न सच.. 

कुछ यादें लेकर बिखर चुके हैं ये,
कुछ यादें अब भी संजोये हैं,
कुछ कहानिया और बाकी हैं मेरी,
जो इनमे मिल जाएँगी, और यादें बन जाएँगी..

कुछ किस्से और बाकी हैं मेरे,
जो मेरे जाने के बाद भी रहेंगे,
जो कभी खो जायेंगे, कभी मिल जायेंगे,
किसी को, कभी मेरी याद दिलाएंगे..

के था एक नादान लिखने वाला,
जो दुनियांदारी छोड़ कर,
इन पन्नों के प्यार में पढ़ गया.. 

इन्ही पन्नो में उसकी हमसफ़र कि बातें थी,
इन्ही पन्नो में उसके यारो के क़िस्से,
इन्ही पन्नो में वो आज़ाद रहा,
इन्ही पन्नो में वो क़ैद,
इन्ही पन्नो पर रोशन हुआ,
और फिर इन्ही पन्नो में डूब गया..

Thursday, 28 November 2013

मिट्टी के बदन पर, क्या इतराना




यादों कि महफ़िल, दिन-रात सजाना,
दर्द के मारो का तो ये है, काम पुराना ।। 

क्यों पूछते हो हमसे, दिल का पता,
भटकते हुए बेघरो का है, क्या ठिकाना ।।

डूबने वालो कि तरफ, देखता भी नहीं,
उगते हुए सूरज का पुजारी है, ये ज़माना ।।

थी बस एक आदमी कि, गलती वहाँ,
पर देखो सर झुकाए बैठा है, सारा घराना ।।

बना है मिट्टी से, आदमी ये "सुमीत"
मिट्टी के बदन पर, क्या इतराना ।।

Friday, 22 November 2013

सोचिये और सोच की सीमा तय करिये




हर चीज की सीमा निर्धारित होनी चाहिए। जैसे रोजाना के जीवन में खाने-पीने काम करने, दौड़ भाग करने, खेलने-कूदने, मनोरंजन आदि सबकी सीमा निर्धारित हो, तो समय का सही नियोजन और उपयोग होगा। समय ही जीवन है। एक-एक क्षण मिलकर जीवन बनता है। जीवन थोक नहीं है, चिल्हरों से बनता है जैसे एक-एक पैसे से रुपया फिर रुपये से सौ, हजार, लाख, करोड़ बनते हैं तो सब इकाई से शुरू होता है इसी तरह जीवन है एक-एक सोच मतलब रखती है।
सोच का संग्रह ही लेखन है, उद्बोधन है, कार्य है चाहे जिस क्षेत्र में हो सब एक सोच से प्रारंभ होता है। अब इसमें आता है सही दिशा में सही सोच जिसे सकारात्मक सोच कहते हैं। गलत दिशा में सोचा गया तो उसे नकारात्मक सोच कहते हैं। पर हम समय प्रबंधन, व्यवसाय या नौकरी प्रबंधन, स्वास्थ्य प्रबंधन और अन्य कई प्रबंधन जो जीवन में होते हैं या हम करते हैं वे सब सोच से प्रारंभ होते हैं। हमें सोच की सीमा तय करना आना चाहिए। कोई सदस्य घर का बीमार है हमें सोचना है उसके इलाज के बारे में, डॉक्टर दवा के बारे में उसे सांत्वना देना है कि कोई बात नहीं, जल्दी ठीक हो जाओगे यदि हम सोचते ही रहे कुछ नहीं किया तो सोच चिंता में बदल जायेगा एक चिन्ता घुसी मन में तो वह अपने पूरे रिश्तेदारों को बुला लेती है भय, मोह, आसक्ति, हड़बड़ी आदि।
मैंने एक डॉक्टर को अपनी विवाहिता पुत्री के डिलवरी पेन दर्द के समय इतना चिंतित भयभीत और हड़बड़ी करते देखा कि मुझे आश्चर्य हुआ कि ये कैसे डॉक्टर हैं जो घर के एक सदस्य के प्रसूति दर्द से इतने परेशान हो गये तो मरीज या उसके सदस्यों का क्या हाल हुआ होगा। मैं मानता हूं कि डॉक्टर भी आखिर इंसान होता है पर उसे इतनी जल्दी घबराना नहीं चाहिए। वह अपने मरीजों को कैसे दिलासा देगा। हर चीज की सीमा तय होनी चाहिए। सीमा से बाहर उसका प्रभाव ऋणात्मक हो सकता है। ऋणात्मकता बहुत नुकसान दायक है, आपके पूरे वजूद को हिला देती है। हम पर हमारा मन ही शासन करता है उसे सुधार लें सकारात्मकता से भर लें तो सब ठीक हो जायेगा।
प्रसिध्द प्रवचनकार सुधांशु महाराज ने कहा है कि, चिन्ता मत करें चिन्तन करें और व्यथा को स्थान न दें व्यवस्था करें। छोटे-छोटे से शब्द हैं पर जीवन को नया मतलब देते हैं। यही तो है जीवन प्रबंधन जिस पर महान चिन्तक  विजयशंकरजी मेहता हमेशा बोलते लिखते रहते हैं। उनकी किताबें भी प्रकाशित हो चुकी हैं। सब कुछ उपलब्ध है दुनिया में अच्छे विचार, अच्छी किताबें, अच्छे लोग, अच्छे कैसेट, रेडियो, टी.व्ही. के कुछ चैनल आस्था और संस्कार अच्छी चीजें परोस रहे हैं। आपको शांत रहकर पढ़ना-सुनना, सोचना करना, चलना है तो ही आप मंजिल पर पहुंचेंगे। बस कोशिश करिये। सोचिये और सोच की सीमा तय करिये। अच्छी सोच बढ़ाइए, घटिया सोच को घटा कर शून्य कर दीजिए, बस यही मेरा संदेश है।

Tuesday, 19 November 2013

ज़िन्दगी कि धुप में यारा, ये ही सहारा है..




आसमान के हर पंछी में, भाई-चारा है,
ज़मीन पर, हर बात का बटवारा है..

उसका घर, मेरे घर से है ऊँचा क्यों,
इस बात पर, भाई ने भाई को मारा है..

कोई चढ़ता है, तो उठा लेते हैं सीढ़ी,
किसी का चढ़ना, हमें कब ग़वारा है..

ना  पाने कि ख़ुशी है, और ना खोने का ग़म,
कितना खुशनसीब, दुनिया में बंजारा है.. 

किस मोड़ पर आयी है, ज़िन्दगी कि कश्ती,
डूब रहे हैं हम, और सामने किनारा है..

वो खुश था कि, जीत गया दिल कि बाज़ी,
बहते आंसुओं ने कहा, कि तू हारा है..

फैला है सर पर, माँ कि छाव का आँचल,
ज़िन्दगी कि धुप में यारा, ये ही सहारा है.. 

Friday, 15 November 2013

संदेह करोगे तो नहीं मिलेगी सक्सेस


शेक्सपियर ने लिखा था, "हमारे संदेह गद्दार हैं। हम जो सफलता प्राप्त कर सकते हैं, वह नहीं कर पाते, क्यूंकि संदेह में पड़कर प्रयत्न ही नहीं करते।" इंसान का स्वाभाव ही ऐसा होता है कि कोई काम शुरू करता है और थोडा सा भी संदेह होने पर काम को रोक देता है और उत्साह पर पानी फिर जाता है। संदेह कि बजाय इंसान को विश्वास को ज्यादा तरजीह देनी चाहिए।


जीवन में आगे बढ़ने के लिए इंसान प्रयत्न करता है और इस प्रयत्न पर संदेह के कारण पानी फिर जाता है। संदेह व्यक्ति के उत्साह को कम कर देता है। संदेह के कारण इंसान सही समय का इंतजार करता रह जाता है। उसे लगता है कि उचित अवसर आने पर काम करूंगा। जो लोग अपनी योग्यता पर शक करते हैं, वे हमेशा दुविधा में रहते हैं कि काम को शुरू भी किया जाए या नहीं। वे हमेशा काम को टालते रहते हैं। उन्हें हमेशा यही महसूस होता है कि अभी सही समय नहीं आया है। वे अपनी दिशा तय नहीं कर पाते और इधर-उधर भटकते रहते हैं। संदेह से पीछा छुड़ाने के लिए मन में विश्वास पैदा करना होगा कि जो काम शुरू किया है, उसमें सफलता जरूर मिलेगी। 

अगर व्यक्ति अपने मन में विश्वास रखे कि वह एक बड़े पुरस्कार के लिए काम कर रहा है और जीत उसी की होगी, तो सफलता निश्चित है। विश्वास एक टॉनिक है, जो इंसान की सारी शक्तियों को सक्रिय कर देता है। संदेह होने पर इंसान कोशिश करना बंद कर देता है और विश्वास के कारण वह मुश्किलों में भी आगे बढ़ता रहता है। अब यह आप पर है कि आप किसे चुनते हैं। मन में बैठे संदेहों को दूर करने के लिए सफलता की मनोकामना भी जरूरी है। जब तक आप खुद संदेह को मौका नहीं देते, तब तक वह आप पर हावी नहीं हो सकता। एक कहावत है, "निश्चय कर लो कि तुम सही हो और फिर आगे बढ़ते जाओ, पर सारा दिन निश्चय करने में व्यतीत मत कर दो।" 

मेरा यही मानना है कि, किसी चीज या परिस्थिति पर शक करने की बजाय आपको तुरंत फैसले लेने होंगे, तभी तेजी से तरक्की कर पाएंगे। आपको अपने मन को समझना होगा और तय करना होगा कि आपको कहां जाना है। संदेह के कारण आप बैठे रहेंगे और दुनिया आगे बढ़ती जाएगी। अपने मन में छुपे डरों को दूर करके विश्वास की ताकत को समझिए। ज्यादातर लोग संदेह इसलिए करते हैं, क्योंकि उनके मन में नकारात्मकता होती है। 

उन्हें लगता है कि वे सफलता के काबिल नहीं है। अगर उन्हें थोड़ी सी विफलता मिलती है तो वे हार मान लेते हैं। इसकी बजाय विफलता मिलने पर ज्यादा ताकत के साथ आगे बढ़ना चाहिए। संदेह को दूर भगाएं। मन में विश्वास जगाएं कि आप आगे बढ़ सकते हैं, आप काबिल हैं और आप भी सफल हो सकते हैं।

Saturday, 26 October 2013

ऐसी तो कभी कोई कहानी नहीं होती




 कुछ यादें ऐसी होती है, जो ज़रा भी सुहानी नहीं होती।
और उसपे सितम ये है की, वो चाहकर भी भुलानी नहीं होती।।

लगता है की ये कलियाँ, बाघबान में खुद ही हैं उजड़ी।
सुना है की अब भवरों को भी, फूलों की चाहत नहीं होती।।

मौसम के बदलने से, अक्सर बदल जाता है मंज़र।
दुनिया में कोई भी चीज़, मेरे दोस्त पुरानी नहीं होती।।

वैसे उसको भी हुनर आ गया है, आँखों से देखने का।
और आजकल तो हमसे भी कोई बात, ज़बानी नहीं होती।।

कभी कभी हम भी कुछ बातें छुपा लेते हैं उनसे अक्सर।
क्यूंकि तारीफ़ के पहलु में यारा, कभी शिकायत नहीं होती।।

यूँ तो रफ़्तार न मिलती कभी, इस कश्ती को हमारी।
इन जज्बातों के दरिया में अगर, इतनी रवानी नहीं होती।।

ये सिर्फ आगाज़ है इस सफ़र का, इसका मगर अंजाम नहीं है।
दुनिया कह रही है की, सुमीत ऐसी तो कभी कोई कहानी नहीं होती।।

Friday, 25 October 2013

शहादत पर सियासत का खेल

मौत का दुख सबको होता है.. अपनों की मौत पर हर कोई रोता है.. लेकिन आंसुओ का मौल सियासत तो नहीं होता है.. इंदिरा जी ने जान गवाई, लेकिन उनकी मौत की सज़ा पूरी एक कौम ने पायी.. पता नहीं कितने घरो में मातम पसरा.. पता नहीं कितनी बेदर्दी से लोगो का दम निकला.. किसी को जिंदा आग में फूंक डाला तो किसी को तलवार से काट डाला.. वो तो अपनों की मौत का मातम भी नहीं मना पाए.. उन्होंने पता नहीं कितने साल अपने उजड़े घरो को बसाने में लगाए.. वो एक जूनून था, जिसमें केवल खून था.. गुस्ताखी एक सरफिरे की थी, लेकिन सज़ा पता नहीं कितनो ने पायी।।



आपने उस दर्द की कहानी सुनाई, लेकिन ज़ख्मो को हरा करने से सूख नहीं मिलता, बल्कि दर्द बढ़ता है, वो चाहे आपको हो या औरो को.. राजीव जी हत्या भी वेह्शियत की उपज थी, लेकिन उनकी मौत की भावुकता में हमने वही गलती दोहराई, जो हमने राजीव जी के जीवन से अपनाई.. राजीव जी को सत्ता से हटाना देश की भूल थी, लेकिन नरसिम्हा राव को प्रधानमंत्री बनाना आपकी चूक थी..
हम जज़्बात से सोचते हैं, इसीलिए हमेशा रोते हैं.. हम वीपी सिंह की साजिशों का शिकार नहीं हुए होते और राजीव सत्ता में रहते तो यह देश शिखर पर होता.. लेकिन उनकी मौत के बाद सोनिया जी ने साहस नहीं दिखाया और राव को प्रधानमंत्री बनाकर देश को मिटाया।।
आज आप फिर से सत्ता मांगते हैं, लेकिन आप अपने नेताओं के गिरेबां में नहीं झांकते हैं.. जब ज़िम्मेदारी का मौका आता है तो आप पीछे हट जाते हैं और मनमोहन जैसे नौकरशाहों को देश थमाते हैं.. जो विदेशियों के हाथों बिक कर देश में महंगाई बढाते हैं.. कॉर्पोरेट जगत के हाथो देशवासियों को लुटवाते हैं.. कभी शेयर बाज़ार में तो कभी वायदा बाज़ार में हम उजड़ जाते हैं, अमीर और अमीर और गरीब भिखारी बनकर ज़िन्दगी बिताते हैं.. राजीव जी और इंदिरा जी तो गद्दारों के हाथो मारे जाते हैं, लेकिन हम तो हर दिन मौत से बदतर ज़िन्दगी बिताते हैं.. आप शहादत पर सियासत का खेल मत खेलिए, वरना हम अपनों की मौत के आंकड़े बताएँगे तो आप गिनती नहीं लगा पाएंगे.. आपके अपने तो शहीद कहलाते हैं, हर पुण्यतिथि पर हम खुद भी आंसू बहाते हैं, लेकिन सच मानिए जब हमारे अपने कभी सडको की दुर्घटनाओं में तो कभी आतंक की बलि चढ़ जाते हैं तो एक दिन की खबर बनकर रह जाते हैं, उनके घर उजड़ जाते हैं, उनके परिवार बिखर जाते हैं, उनका कोई सहारा नहीं बचता है.. सच बताये तो उन्हें मातम का भी वक़्त नहीं मिलता है, इसीलिए आंसुओं का हिसाब मत मांगिये, दर्द की सियासत का हिस्सा मत बनिए।।
अगर आप ईमानदार हैं, तो अपनी इमानदारी इमानदारी दिखाइए.. सच कहने के साहस का विश्वास दिलाइये.. जिस तरह आपने दागी सांसदों का अध्यादेश फाड़ा था वैसे तेवर दिखाईये.. और इस देश को शिखर तक पहुचाने की कसमे खाईये, जो सोचते हैं वो कर के दिखाईये.. अपनों से लड़ने का जौहर जिस तरह आपने दिखाया उसको आधार बनाईये.. पहले कांग्रेस की गन्दगी मिटाइये फिर जनता को आजमाईये.. फिर सत्ता आप इस तरह पाएंगे की अंगद की तरह डटे नज़र आयेंगे।। 

Wednesday, 23 October 2013

ज़िन्दगी की दुकान पर हम सबकी उधारी है




ज़िन्दगी की दुकान पर हम सबकी उधारी है,
चलती हुई सांसो का उधार, बहुत भारी है॥

ज़िन्दगी है कभी बहार, तो कभी पतझङ भी है,
कभी फूल की पत्ती है, तो कभी चिँगारी है॥

हमेशा खुद की ही राहों में, ज़िन्दगी गुजारी है,
अब तो धुप भी हमारी है, छाव भी हमारी है॥

इन मासूम और सीधे चहरो पर, ऐतबार मत करना,
शहर में सियासत के, कुछ दोस्त भी शिकारी हैं॥

बाप बोझ ढोता था, क्या दहेज़ दे पता बेचारा,
इसी लिए ही वो शहज़ादी आज तक कुंवारी है॥

मोड़ लेने वाली है, ज़िन्दगी कोई शायद,
अब के फिर इन हवाओं में, एक बेक़रारी है॥

वक्त की धूप मेँ ओढ़ाती है जब अपना आँचल,
ज़िन्दगी अपनी माँ की तरह लगती, प्यारी है॥

ज़िन्दगी की दुकान पर हम सबकी उधारी है,
चलती हुई सांसो का उधार, बहुत भारी है॥

Tuesday, 22 October 2013

खाली हाथ शाम आई है



में हमेशा बचता हु अपने ब्लॉग पर ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करने से जो मुझे या मेरे पाठको को demotivate करे, पर अपनी एक मित्र के ब्लॉग से याद आये गीत को जब कल रात काफी समय बाद वापस सुना, तो उसके शब्दों का शायद जादू ही था जो आप सब के बीच वो गीत शेयर करने का मन हुआ.. 
गीत है गुलज़ार साहब का लिखा और आशा भोसले का गाया, इजाज़त (१९८८) फिल्म का, खाली हाथ शाम आई है, खाली हाथ जाएगी.. 
गीत में लेखक ने अधूरेपन, दुःख, दर्द और इंतज़ार को बड़ी सहजता और सरलता से बयां किया है, उस वक़्त मेरे आस पास का शांत माहोल भी  मेरा पूर्ण सहयोग कर रहा था, उस गीत में खो जाने के लिए.. 
वाकई खुबसूरत, एक बार ज़रूर सुनिये।।





खाली हाथ शाम आई है, खाली हाथ जाएगी।
आज भी ना आया कोई,
आज भी ना आया कोई, खाली लौट जाएगी।
खाली हाथ शाम आई है, खाली हाथ जाएगी।
खाली हाथ शाम आई है।। 


आज भी ना आये आंसू,
आज भी न भीगे नैना,
आज भी ना आये आंसू,
आज भी न भीगे नैना,
आज भी ये कोरी रैना, कोरी लौट जाएगी।
खाली हाथ शाम आई है, खाली हाथ जाएगी।
खाली हाथ शाम आई है।। 


रात की स्याही कोई,
आये तो मिटाए ना,
रात की स्याही कोई,
आये तो मिटाए ना,
आज ना मिटाए तो ये, कल भी लौट आएगी।


खाली हाथ शाम आई है, खाली हाथ जाएगी।
खाली हाथ शाम आई है।। 
आज भी ना आया कोई, खाली लौट जाएगी।
खाली हाथ शाम आई है, खाली हाथ जाएगी।
खाली हाथ शाम आई है।।

Saturday, 19 October 2013

प्यार तो खुद आपके पास भी बहुत है

कुछ लोगो को प्यार के पीछे भागते देखा है हमने कई बार, पर मेरा मानना है की उन लोगो को तो प्यार का एहसास तक नहीं है, तब ही तो वो उसके पीछे भाग रहा है! दुनिया की इस दौड़ धुप में हर आदमी कुछ न कुछ चाहता है, हर दम किसी को ढूँढना और पाना चाहता है। हर दिल में यही ख्वाहिश होती है की कोई हो जो उसे बहुत ज्यादा प्यार करे, उसका हर दम ख्याल रखे, उसकी भावनाओं को समझे।।



पर दोस्तों, हम हमेशा ऐसा ही क्यों चाहते है "की कोई ऐसा हो..." हम हरदम किसी में अपना हमदम क्यों ढूँढ़ते हैं..? पर शायद हम इसी में गलती करते हैं, जो हम हमेशा अपना प्यार दुसरो में ढूँढ़ते हैं। बचपन में जब मुझे प्यार का एहसास नहीं था तब में हमेशा सोचता की अगर भगवन ने हमें दिल दिया है तो वो दीखता क्यों नहीं? और अगर विज्ञान कहता है की दिल एक इंजन है जिस से हम जीते हैं। तो आशिक हमेशा दिल टूटने पर रोते क्यूँ हैं?
अरे भाई, ज़िन्दा हो इसका मतलब है की दिल टूटा नहीं है.. सिर्फ ज़ख़्मी हुआ है..! है ना..?

खैर, हम हमेशा अपने दुखों को जितना चाहे उतना बढ़ा सकते हैं.. क्योंकि किसको कितनी ज्यादा अहमियत देनी है हम अच्छी तरह से जानते हैं.. में सिर्फ इतना कहना चाहता हूँ की बचपन से जवानी तक, जवानी से बुढ़ापे तक हम हमेशा किसी न किसी चीज़ की डिमांड ही करते हैं, कभी पैसे की, कभी सुख-सुविधाओं की, कभी  शांति की, तो कभी प्यार की.. हम डिमांड बहुत ज्यादा करते हैं पर सप्लाई बहुत कम।। 

हमें प्यार बेशुमार चाहिए पर उसे पाने की और निभाने की क्षमता बहुत कम। जब हम चाहते हैं की हमें बहुत प्यार करने वाला जीवनसाथी चाहिए, तब हम ये क्यूँ भूल जाते हैं की सामने वाला व्यक्ति भी हमसे वही चाहता है, इसीलिए तो पास आया है। ऐसे तो दो व्यक्ति हमेशा एक दुसरे को आजमाते रहेंगे, और एक दुसरे की अपेक्षा में खरे नहीं उतर पाएंगे! क्यूंकि हम चाहते हैं की "हमें प्यार मिले"… "कोई मेरा हो जाये"… पर ये नहीं सोचते की में किसी का हो जाऊ। सच्चा प्यार हमेशा निस्वार्थ होता है, प्यार किसी को पाना नहीं, पर खुद उसमे खो जाना है…  प्यार वो है की कोई इसीलिए जीता है "क्योंकि मेरा हमदम है…!"

हमें प्यार की तलाश करने की कोई ज़रूरत नहीं, क्यूंकि हमें सच्चे प्यार की बहुत कम समझ है। क्यूंकि जब तक हम तलाश करते हैं, किसी का प्यार हाथ से छुट जाता है। और जब तलाश ख़त्म होती है तब तक वो वक़्त और मौका हाथ से निकल चूका होता है.. बस दोस्तों दिल में इतना प्यार रखिये की अगर आप वो किसी को भी दे तो वो एक पल भी आपके बिना जी ना पाए… 
सनम हो न हो, प्यार मिले न मिले, उसे बाटना चहिये… दुनिया में बहुत से रिश्ते हैं, जो शायद हमें प्यार करने के लिए ही मिले हैं। भगवान् ने सिर्फ हमें दो चीज़े दी हैं, एक है वक़्त और एक है प्यार! दोस्तों अगर प्यार खोजते रहोगे तो वक़्त निकल जायेगा और अगर सच्चे प्यार को खो दोगे तो वक़्त तुम्हे हराएगा! जो रिश्ते हमारे पास हैं अगर हम उन्ही में अपना प्यार नहीं बाट सकते तो किसी नए को क्या देंगे।।

Love yourself, Love everyone……
Who knows love when enter your life……..!

वक़्त का सदुपयोग करो, अपना करियर बनाओ… और रही प्यार की बात तो वो आपके पास ही है! ये वो कस्तूरी है जिसके पीछे हर मृग दीवाना है, हर दम उसे ढूँढता है पर भूल जाता है की वो तो खुद में इतनी भरी पढ़ी है की अगर तुम उसे न दो तो खुद पागल हो जाओगे इस खोज में.… 
आप पागल मत बनिए बल्कि खुद में झाकिये, प्यार आपके पास बहुत है.. ज़रूरत है तो सिर्फ उसे महसूस करने की और बाटने कि… 


Do not run through life so fast that you forget not only where you have been,
but
Also where you are going...
Life is not a race,
but
A journey to be savored each step of the way...

Monday, 14 October 2013

ज़ख्म यादों के परों से दिल में उतर जाते हैं





कुछ उग चुके कांटे, जब मुझे बहुत तड़पाते हैं,
पलकों के ठिकाने पे, अपने दर्द को पहुंचाते हैं।
मैं तब यह राज़ जान कर, ठगा सा रह जाता हूँ,
ज़ख्म यादों के परों से दिल में उतर जाते हैं ।


कभी यादें मंझधार, कभी खुद किनारा होती हैं,
राह में गिराती हैं, कभी सबका सहारा होती हैं ।
मैं आईने में खुद को, जब सीधा खडा देखता हूँ,
सारे अक्स, मेरे यादों की हवा से लड़खड़ाते हैं ।
ज़ख्म यादों के परों से दिल में उतर जाते हैं ।


यादें साज़ भी हैं, यादें ही संगीत, सुर औ राग हैं,
यादें नज़रों का नूर भी है, और चहरे के भी दाग हैं ।
मैं जब जानना चाहूँ इनको, ये कुछ और हो जाती हैं,
मेरे सारे सपने कैसे इस सागर में घुल जाते हैं ।
ज़ख्म यादों के परों से दिल में उतर जाते हैं ।


Sunday, 13 October 2013

ज़माने का ज़हर



शीशे का जो मेरा घर नहीं होता,
किसी के हाथ में पत्थर नहीं होता।।

कौन बताये हुस्न बड़ा है या इश्क,
सामना कभी खुल कर नहीं होता।।

पाया है भला किस ने दिल का पता,
खाना-बदोशो का कोई घर नहीं होता।।

कभी एक नज़र में हो जाता है प्यार,
कभी हमसफर के साथ सफ़र नहीं होता।।

मोहब्बत से बनता है कोई घर, घर,
इंट-पत्थर से बना घर, घर नहीं होता।।

इस भरम में बेचारे लोग मारे गए,
फूल के हाथो में खंजर नहीं होता।।


पीना पढता है यहाँ ज़माने का ज़हर,
नाम से "सुमीत" कोई शंकर नहीं होता।।



Saturday, 12 October 2013

ज्ञान और अज्ञान के बीच

आज जब कुछ लोगो के बीच बैठ कर उनकी बातें सुन रहा था, वहाँ वो सब किसी शख्स की बुराई कर रहे थे.. 
सभी के अपने-अपने मत थे वहाँ.. आखिर सब एक से बढ़ कर एक ज्ञानी जो थे.… कोई कह रहा था की वो शख्स ऐसा है, कोई कह रहा था की वो शख्स वैसा है.. सभी के अपने अपने विचार थे जो उन्होंने अलग अलग पहलुओ को देख कर बनाये थे। 
 में उन लोगो की बातें सुन कर बस यही सोच रहा थे की हम किसी के बारे में कुछ कहने, सोचने या निर्णय लेने वाले होते कौन है। किसने दिया हमें इतना हक़…। और सब से ज़रूरी बात तो ये की हमें इस से मिल क्या रहा है?
सत्‍य के संबंध में विवाद सुनता हूं, तो आश्चर्य होता है। निश्चय ही जो विवाद में हैं, वे अज्ञान में होंगे। क्योंकि, ज्ञान तो निर्विवाद है। ज्ञान का कोई पक्ष नहीं है। सभी पक्ष अज्ञान के हैं। ज्ञान तो निष्पक्ष है। फिर, जो विवादग्रस्त विचारधाराओं और पक्षपातों में पड़ जाते हैं, वे स्वयं अपने ही हाथों सत्य के और स्वयं के बीच दीवारें खड़ी कर लेते हैं। मेरा यही मानना है की: विचारों को छोड़ों निर्विचार हो रहो। पक्षों को छोड़ो और निष्पक्ष हो जाओ। क्योंकि, इसी भांति वह प्रकाश उपलब्ध होता है, जो कि सत्य को उद्घाटित करता है।


एक पुराना लेख याद आता है जब एक अंधकार पूर्ण गृह में एक बिलकुल नए और अपरिचित जानवर को लाया गया। उसे देखने को बहुत से लोग उस अंधेरे में जा रहे थे। चूंकि घने अंधकार के कारण आंखों से देखना संभव न था, इसलिए प्रत्येक उसे हाथों से स्पर्श करके ही देख रहा था। एक व्यक्ति ने कहा- राजमहल के खंभों की भांति है, यह जानवर। दूसरे ने कहा- नहीं, एक बड़े पंखे की भांति हैं। तीसरे ने कुछ कहा और चौथे ने कुछ और। वहां जितने व्यक्ति थे, उतने ही मत भी हो गये। उनमें तीव्र विवाद और विरोध हो गया। सत्य तो एक था। लेकिन, मत अनेक थे। उस अंधकार में एक हाथी बंधा हुआ था। प्रत्येक ने उसके जिस अंग को स्पर्श किया, उसे ही वह सत्य मान रहा था। काश! उनमें से प्रत्येक के हाथ में एक-एक दिया रहा होता, तो न कोई विवाद पैदा होता, न कोई विरोध ही! उनकी कठिनाई क्या थी? प्रकाश का अभाव ही उनकी कठिनाई थी। वही कठिनाई हम सबकी भी है। जीवन सत्य को आतंरिक प्रकाश में ही जाना जा सकता है। जो विचार से उसका स्पर्श करते हें, वे निर्विवाद सत्य को नहीं, मात्र विवादग्रस्त मतों को ही उपलब्ध हो पाते है।
सत्य को जानना है, तो सिद्धांतों को नहीं, प्रकाश को खोजना आवश्यक है। प्रश्न विचारों का नहीं, प्रकाश का ही है। और, प्रकाश प्रत्येक के भीतर है। जो व्यक्ति विचारों की आंधियों से स्वयं को मुक्त कर लेता है, वह उस चिन्मय-ज्योति को पा लेता है, जो कि सदा-सदा से उसके भीतर ही जल रही है।

Thursday, 3 October 2013

ख्वाब सुनहरे ही रहते हैं



खुशियों के मौसम उस जगह ठहरे ही रहते हैं,
उम्मीदों के पेढ़ जहाँ हमेशा हरे ही रहते हैं... 

यादों के मोती समंदर में गहरे ही रहते हैं,
कुछ जख्म ऐसे होते हैं की हरे ही रहते हैं...

कौन कह सकता है, कैसी है सूरत किसी की,
चेहरे पे लोगों के हरदम चेहरे ही रहते हैं...

अब न जाने ये दूरियाँ किस तरह कम होंगी,
हम बढ़ते हैं आगे, मगर वो ठहरे ही रहते हैं...

दर्द-ए-दिल ज़ुबान से भी हो जाए अगर ज़ाहिर,
पत्थर दिल वालों के कान हमेशा बहरे ही रहते हैं...

ज़िन्दगी चाहे लिख रही हो काजल के गीत,
ख्वाब पलकों पे हमारी "सुमित" सुनहरे ही रहते हैं... 

Wednesday, 25 September 2013

वो तंग करें और हम प्रेम करें...

हर रिश्ते में हम यही चाहते हैं कि दूसरा हमें समझे, और वैसा ही बरताव करे जैसा हम चाहते हैं। जब ऐसा नहीं हो पाता तो रिश्ते में कड़वाहट और फिर दरार आनी शुरु हो जाती है। अगर हम उस दरार को बढ़ने से रोक नही पाए तो रिश्ते टूट भी जाते हैं ।

आप इस दुनिया में ज़िंदगी जी रहे हैं तो जाहिर है कई तरह के पेचीदा रिश्ते बनते ही रहेंगे। आपको लोगों की सीमाओं और क्षमताओं को समझना होगा, और फिर सोचिए कि आप क्या कर सकते हैं; जो आप कर सकते हैं वो करिए। तभी आपको हालात को अपने मुताबिक बदलने की शक्ति मिल पाएगी। अगर आप इस बात का इंतज़ार करेंगे कि लोग आपको जान-समझ कर आपके मुताबिक काम करेंगे तो यह बस खयाली पुलाव है; ऐसा कभी नहीं होने वाला।


रिश्ते जितने करीबी होंगे उनको समझने के लिए आपको उतनी ही ज़्यादा कोशिश करनी होगी। एक आदमी के साथ ऐसा हुआ कि वह कई महीनों के लिए ‘कोमा’ में जाता और फिर होश में आ जाता। ऐसा काफी दिनों से चलता आ रहा था। उसकी पत्नी दिन-रात उसके सिरहाने बैठी रहती। एक बार जब उसको होश आया तो होशो-हवास के कुछ ही पलों में उसने अपनी पत्नी को और पास आने का इशारा किया। जब वह उसके करीब बैठ गयी तो उसने कहना शुरु किया, “मैं सोचता रहा हूं……… तुम मेरी ज़िंदगी के हर बुरे दौर में मेरे साथ रही हो। जब मेरी नौकरी छूट गयी तो तुम मेरे साथ थी। जब मेरा कारोबार ठप्प हो गया तो तुम दिन-रात काम करके घर चलाती रही। जब मुझे गोली मारी गयी तब भी तुम मेरे पास थी। जब उस कानूनी लड़ाई में हमने अपना घर खो दिया तब भी तुम मेरे बिल्कुल पास थी। अब मेरी सेहत कमज़ोर हो चली है तब भी तुम मेरे बगल में हो। जब मैं इन सब बातों पर गौर करता हूं तो मुझे लगता है कि तुम मेरे लिए हमेशा दुर्भाग्य ही लाती रही हो!”


ऐसा नहीं है कि दूसरे इंसान में समझदारी नाम की कोई चीज़ ही नहीं है। अपनी समझदारी से आप ऐसे हालात पैदा कर सकते हैं कि दूसरा इंसान आपको बेहतर ढंग से समझ सके। दूसरे इंसान की सीमाओं को समझे बिना, उसकी जरूरतों को जाने बिना, उसकी काबिलियत और संभावनाओं को आंके बिना अगर आप यह उम्मीद करते हैं कि वह हरदम आपको जान-समझ कर आपके अनुसार चलता रहे, तो फिर लड़ाई के अलावा और क्या होगा! यह तो होना ही है। ऐसा इसलिए होता है कि आपकी और उनकी सोच की सीमा-रेखा बिलकुल अलग-अलग है। अगर आप इस एल.ओ.सी. को पार कर जाएंगे तो फिर उनको गुस्सा आना लाजिमी है। और अगर वे पार करें तो आपका नाराज़ होना लाजिमी है।

अगर आप अपनी समझ की सीमा को इतना बढ़ा लें की उनकी समझ भी उसमें समा जाए तो आप उनकी सीमाओं और क्षमताओं को अपना सकेंगे। हर इंसान में कुछ चीज़ें सकारात्मक होती हैं और कुछ नकारात्मक। अगर आप इन सब चीज़ों को अपनी समझ में शामिल कर लेंगे तो आप रिश्ते को अपने मुताबिक ढाल सकेंगे। अगर आप इसको उनकी समझ पर छोड़ देंगे तो यह महज संयोग होगा कि कुछ अच्छा हो जाए। अगर वे उदारमना हैं तो आपके लिए सब-कुछ बहुत अच्छा होगा और नहीं तो रिश्ता टूट जाएगा।

मैं आपसे बस यह पूछ रहा हूं: क्या आप चाहते हैं कि आप खुद इस बात को तय कर सकें कि आपकी ज़िंदगी के साथ क्या हो? रिश्ते चाहे निजी हों या व्यावसायिक, राजनीतिक, या किसी और तरह के हों, क्या आप नहीं चाहते कि ये आप तय करें कि आपकी ज़िंदगी में क्या होना चाहिए? अगर आप ऐसा चाहते हैं तो ये ज़रूरी है कि आप हर चीज़ और हर इंसान को अपनी समझ में शामिल कर लें। आपको अपनी समझ का दायरा इतना ज़्यादा बढ़ाना होगा कि आप लोगों के पागलपन तक को समझ सकें। आपके इर्द-गिर्द बड़े अच्छे लोग हैं जो कभी-कभार कुछ पलों के लिए पगला जाते हैं। अगर आप यह बात नहीं समझेंगे, उनके पागलपन को नहीं समझेंगे तो उनको निश्चित रूप से खो देंगे। अगर समझते हैं तो फिर यह भी आप जान जाते हैं कि उनसे कैसे पेश आया जाए।

ज़िंदगी हमेशा सीधी लकीर की तरह नहीं होती। इसे चलाने के लिए आपको बहुत-कुछ करना होता है। अगर आप अपनी समझ को किनारे कर देंगे तो आपकी काबिलियत घट जाएगी। सवाल चाहे निजी रिश्तों का हो या फिर व्यावसायिक प्रबंधन का दोनों के लिए आपको एक विशेष समझ चाहिए; वरना आपके रिश्ते कामयाब नहीं हो पायेंगे।



Sunday, 18 August 2013

अबकी बार



बहुत लड़े हम अबकी बार,
जीवन की गहमा गहमी में आते रहे 
उतार चढ़ाव।।

किसने देखे किसने जाने
इस दुनिया के ताने बाने,
कितनी बातें कितनी शर्तें
तर्कों  पर तर्कों  की पर्तें,
भूल गए हम दोनो तो हैं एक नाव की 
दो पतवार।।

चलो काम को कल पर टालें
कुछ पल तो हम साथ बितालें,
साथ बुने जो सपने मिल कर
आओ उनको पुनः संभालें,
हाथ मिलाकर आज फिर सजालें अपने सुख
का परिवार।।

बहुत लड़े हम अबकी बार।।


Friday, 24 May 2013

अगर नहीं होता



वो हम सफ़र है मगर हमज़बान नहीं होता,
ईंट पत्थर से बना घर मकान नहीं होता।।

लिखी जाती है जिगर के खून से इबारत,
स्याही से दिल का दर्द बयान नहीं होता।।

पिघल जाता उसके सीने में अगर होता दिल,
शायद वो पत्थर है, मेहरबान नहीं होता।।

जिसके अन्दर हौसले का चिराग जलता है,
वक़्त की आंधी से परेशान नहीं होता।।

वो लोग जिनको छत नहीं है मयस्सर,
क्या करते अगर ऊपर आसमान नहीं होता।।

आइना वक़्त का दिखाता है सब की सूरत,
अपनी सूरत से जुदा कोई इन्सान नहीं होता।।

लड़ना है ज़िन्दगी के मैदान में हर एक पल,
एक दो दिन में कभी इम्तिहान नहीं होता।।

Wednesday, 22 May 2013

सफ़र....




ज़िन्दगी का सफ़र कुछ अजीब सा लगा,
जो अपना मिला वो कुछ करीब सा लगा,
हमने तो अपनी खुशियाँ सबपे लुटा दीं ,
और दुसरों से उम्मीद की तो वो गरीब सा लगा।।
ना जाने लोग क्यों कतरातें हैं,
अपना कहने से शरमाते हैं,
दो दिन की तो ये ज़िन्दगी है बस,
और उसमे भी लोग घबराते हैं।।

खुश रहो और दूसरों को खुश रहने दो,
दूसरों से कहो और उन्हें भी खुद से कुछ कहने दो,
दो दिन के लिए आये हो अच्छे से जी लो,
इन्सान हो तो खुद को इन्सान ही रहने दो।।
दुनिया में हर चीज़ यूँही नहीं मिलती,
कोई वजह ना हो तो ये हवा भी नहीं चलती,
सफ़र तो उस नदी ने भी तय किया था,
नहीं करती तो वो कभी सागर से नहीं मिलती।।

इन्सान हो तो दूसरों के लिए जीना सीखो,
मुश्कील पड़े तो उससे निकलना सीखो,
यूँ तो एक जानवर भी अपने बच्चे को बचाता है,
फिर तुम भी जरुरत पड़े तो ज़हर का घूँट पीना सीखो।।
आज तुम करोगे ,कल तुम्हारे लिए भगवान करेगा,
एक ख़ुशी तुम दो और वो तुम पर सौ ख़ुशी मेहरबान करेगा,
इन्सान से फिर तुम फ़रिश्ता बन जाओगे,
और हर शख्स तुम्हे भगवान का दूजा नाम कहेगा।।

इतनी ख़ुशी दे दो की कभी कमी न पड़े,
सब साथ रहें और कम ये ज़मी ना पड़े,
फिर तो जीने का मजा ही अलग होगा,
और साथ तुम्हारे हमेशा भगवान भी होगा।।

Monday, 20 May 2013

जो भी किया, किया है हमने




वक़्त की रेत पर इन उँगलियों को, चलाया है हमने,
ख्वाबो के नगर में एक घरोंदा, बनाया है हम ने।।

आंसुओं के दरिया में दिल को, बहाया है हमने,
और इस तरह से दर्द का रिश्ता, निभाया है हम ने।।

दुश्मनी का हर निशान दिल से, मिटाया है हमने,
जिसने हमको मिटाया उसे ही, बनाया है हम ने।।

मोहब्बत के सफ़र में लिया था हमने अनोखा क़र्ज़,
किसी ने माँगा नहीं फिर भी, चुकाया है हम ने।।

दुश्मनी में भी निभाई है दोस्ती हमने "सुमीत"
शीशमहल में रह कर भी सबको पत्थर, थमाया है हम ने।।


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Thursday, 11 April 2013

जीने का अंदाज़





हर किसी का अपना अपना जीने का अंदाज़ है,
पर ये अंदाज़ मेरा मुझसे ही क्यूँ राज़ है…

कोशिशें ख़ुद को समझने की तो मैं हर-एक करुं ,
क्यूंकि समझाना ख़ुद को यारों ये न आसां काज है…
हर किसी का अपना-अपना जीने का अंदाज़ है …

कोशिशें करता रहता, भ्रम में पड़ जाता हूँ मैं,
क्यूंकि कोशिशों से भी कोई खुलता न पूरा राज़ है…
हर किसी का अपना-अपना जीने का अंदाज़ है …

ख़ुद को पाया था कभी, पर बिछडा भी हूँ ख़ुद से बार बार,
क्यूंकि ख़ुद को पाना, ख़ुद से बिछडना ही तो जिन्दगी का साज़ है…
हर किसी का अपना-अपना जीने का अंदाज़ है …

जिन्दगी का साज़ भी, कैसे कोई समझे भला,
क्यूंकि जिसके पीछे भागती है दुनिया, सब माया का जंजाल है…

हर किसी का अपना-अपना जीने का अंदाज़ है …
पर ये अंदाज़ मेरा मुझसे ही क्यूँ राज़ है…


Wednesday, 27 February 2013

इस सृष्टि का कोई तो रचयिता है


प्राचीन काल से ही मनुष्य के मन में यह प्रश्न उठता रहा है कि सृष्टि का आरंभ कब हुआ, कैसे हुआ, क्या यह संभव है कि मनुष्य कभी यह समझ सके कि चाँद, सितारे, आकाशगंगाएं, पुच्छलतारे, पृथ्वी, पर्वत, उसकी ऊँची ऊँची चोटियाँ, जंगल, कीड़े-मकोड़े, पशु, पक्षी, मनुष्य, जीव-जन्तु यह सब कहाँ से आए और कैसे बने? 

हमने और आपने हो सकता है न सोचा हो किन्तु हज़ारों वर्षों से इस पृथ्वी पर रहने वाले मनुष्यों ने सोचा और यहीं से धर्म का जन्म हुआ। 

हम ब्रहमाण्ड की रचना की जटिल बहस का उल्लेख नहीं करेंगे क्योंकि बिग-बैंग, जो इस सृष्टि की रचना का कारण बताया जाता है, उस पर भी वैज्ञानिकों ने बहुत से प्रश्न उठाए हैं। यहाँ बस केवल एक प्रश्न है जो हर काल में प्रायः हर मनुष्य के मन में उठता रहा है कि क्या कोई वस्तु बिना किसी बनाने वाले के बन सकती है?
में यहाँ सिर्फ अपने दिल की बातें आपके सामने रख रहा हु।

एक अरब ग्रामीण से पूछा गया कि तुमने अपने ईश्वर को कैसे पहचाना? तो उसने उत्तर दिया कि ऊँट की मेंगनियाँ, ऊँट का प्रमाण हैं, पद-चिन्ह किसी पथिक का प्रमाण हैं, तो क्या इतना बड़ा ब्रह्माण्ड, यह आकाश, और कई परतों में पृथ्वी, किसी रचयिता का प्रमाण नहीं हो सकती!

यह अत्यधिक सादे शब्दों में ईश्वर के अस्तित्व के बारे में दिया जाने वाला वह प्रमाण है जिस पर बड़े-बड़े दार्शनिकों ने बहस की है और अपने विचार व्यक्त किए हैं, किन्तु अधिकांश लोगों ने ब्रह्माण्ड में मौजूद व्यवस्था को, ईश्वर के अस्तित्व का सबसे बड़ा प्रमाण माना है, और में यहाँ इश्वर को कोई नाम नहीं देना चाहुंगा, बस उसे उर्जा का एक अनंत स्त्रोत मान रहा हु।

अल्लामा हिल्ली एक बहुत प्रसिद्ध शीया बुद्धिजीवी थे। उनके काल में एक नास्तिक बहुत प्रसिद्ध हुआ। वह बड़े बड़े आस्तिकों को बहस में हरा देता था, उसने अल्लामा हिल्ली को भी चुनौती दी। बहस के लिए एक दिन निर्धारित हुआ और नगरवासी निर्धारित समय और निर्धारित स्थान पर इकट्ठा हो गए। 

वह नास्तिक भी समय पर पहुंच गया, किन्तु अल्लामा हिल्ली का कहीं पता नहीं था। काफ़ी समय बीत गया लोग बड़ी व्याकुलता से अल्लामा हिल्ली की प्रतीक्षा कर रहे थे कि अचानक अल्लामा हिल्ली आते दिखाई दिए। उस नास्तिक ने अल्लामा हिल्ली से विलंब का कारण पूछा तो उन्होंने विलंब के लिए क्षमा मांगने के पश्चात कहा कि वास्तव में मैं सही समय पर आ जाता, किन्तु हुआ यह कि मार्ग में जो नदी है उसका पुल टूटा हुआ था और मैं तैर कर नदी पार नहीं कर सकता था, इसलिए मैं परेशान होकर बैठा हुआ था कि अचानक मैंने देखा कि नदी के किनारे लगा पेड़ कट कर गिर गया और फिर उसमें से तख़्ते कटने लगे और फिर अचानक कहीं से कीलें आईं और उन्होंने तख़्तों को आपस में जोड़ दिया और फिर मैंने देखा तो एक नाव बनकर तैयार थी। मैं जल्दी से उसमें बैठ गया और नदी पार करके यहाँ आ गया। 

अल्लामा हिल्ली की यह बात सुनकर नास्तिक हंसने लगा और उसने वहाँ उपस्थित लोगों से कहाः "मैं किसी पागल से वाद-विवाद नहीं कर सकता, भला यह कैसे हो सकता है? कहीं नाव, ऐसे बनती है?" यह सुनकर अल्लामा हिल्ली ने कहाः "हे लोगो! तुम फ़ैसला करो। मैं पागल हूँ या यह, जो यह स्वीकार करने पर तैयार नहीं है कि एक नाव बिना किसी बनाने वाले के बन सकती है, किन्तु इसका कहना है कि यह पूरा संसार अपने ढेरों आश्चर्यों और इतनी सूक्ष्म व्यवस्था के साथ स्वयं ही आस्तित्व में आ गया है"। नास्तिक ने अपनी हार मान ली और उठकर चला गया।

मानव इतिहास के आरंभ से ही ईश्वर को मानने वाले सदैव अधिक रहे हैं अर्थात अधिकांश लोग यह मानते हैं कि इस संसार का कोई रचयिता है, अब वह कौन है? कैसा है? और उसने क्या कहा है? इस बारे में लोगों में मतभेद है किन्तु यही सच है कि यदि सही अर्थ में कोई धर्म है तो फिर उसका उद्देश्य भी मनुष्य को ईश्वर तक पहुँचाना होता है। वैसे यह बिन्दु भी स्पष्ट रहे कि ईश्वर और धर्म को मानने में ही भलाई हैं, क्योंकि आप दो ऐसे व्यक्तियों के बारे में सोचें कि जिनमें से एक धर्म और ईश्वर को मानता है और दूसरा नहीं मानता। उदाहरण स्वरूप दो व्यक्ति किसी ऐसे नगर की ओर जा रहे हैं जहाँ के बारे में दोनों को कुछ नहीं मालूम है। मार्ग में उन्हें एक अन्य व्यक्ति मिलता है जो उनसे कहता है कि जिस नगर में तुम दोनों जा रहे हो वहाँ खाने पीने को कुछ नहीं मिलेगा, इसलिए उचित होगा कि वहाँ के लिए थोड़ा भोजन और पानी रख लो तो ऐसी स्थिति में बुद्धि क्या कहती है? 

बुद्धि यही कहती है कि वहाँ के लिए कुछ खाना पानी रख लिया जाए, क्योंकि यदि वह सही कह रहा होगा तो मरने का ख़तरा टल जाएगा और यदि झूठ बोल रहा होगा तो कोई हानि नहीं होगी। अब इस कल्पना के दृष्टिगत एक व्यक्ति ने खाना पानी रखा लिया किन्तु दूसरे ने कहा कि इस व्यक्ति ने मज़ाक़ किया है, या यह कि झूठ बोल रहा था, या यह कि देखने में भरोसे का आदमी नहीं लग रहा था, यह सोच कर उसने कुछ साथ नहीं लिया। नगर आया तो उसने देखा कि खाना पानी सब कुछ था, जो व्यक्ति खाना पानी साथ लाया था उसने उसे फेंक दिया, बस सब कुछ ठीक हो गया, किन्तु दूसरी स्थिति में सोचें कि ये दोनो यात्री उस नगर में जब पहुंचे तो देखा कि वहाँ कुछ भी नहीं था तो अब जिसने अपने साथ खाना पानी रख लिया था, उसकी तो जान बच गई किन्तु जिसने उसकी बात पर विश्वास नहीं किया था वह भूख और प्यास से मर गया।

इसिलए बुद्धि हमें यह सिखाती है कि यदि ख़तरा या लाभ बहुत बड़ा हो तो उसकी सूचना देने वाला चाहे जैसा हो, बुद्धि कहती है कि उसके लिए कुछ प्रबंध अवश्य करना चाहिए। यदि दस ग्लास पानी हमारे सामने रखा है और कोई कहता है कि किसी एक में विष है तो बुद्धि कहती है कि किसी भी ग्लास का पानी न पिया जाए।

इस संसार में बहुत से लोग आए जो विदित रूप से अच्छे मनुष्य थे, लोगों की सहायता करते थे, अच्छे कार्य करते थे, लोकप्रिय थे, किन्तु वे कहा करते थे कि हम ईश्वरीय दूत हैं, इस संसार का एक रचयिता है, मरने के बाद एक अन्य लोक है जहाँ कर्मों का हिसाब किताब होगा और अच्छे कार्य करने वालों को स्वर्ग और बुरे कार्य करने वालों को नरक में भेजा जाएगा। 

तो फिर इस संदर्भ में हमारी बुद्धि क्या कहती है? यदि हम केवल बुद्धि की बात मानें तो होना यह चाहिए कि हम यह सोचें कि यदि इन लोगों ने सही कहा होगा तो हम स्वर्ग में जाएंगे और नरक में जाने से बच जाएंगे किन्तु यदि उन लोगों ने ग़लत कहा होगा तो मरने के बाद मिट्टी में मिल जाएंगे और परलोक नाम का कोई लोक नहीं होगा और हमें कोई हानि भी नहीं होगी। हमने अपने जीवन में जो अच्छे कर्म किए उसके कारण लोग हमें याद रखेंगे।

इन सब बातों से यह निष्कर्ष निकलता है कि इस सृष्टि का कोई रचयिता है, क्योंकि कोई भी वस्तु बिना बनाने वाले के नहीं बनती। बनाने वाले को अधिकांश लोग मानते हैं, उसे पहचानने के लिए विभिन्न लोगों को भिन्न-भिन्न मार्ग अपनाना पड़ता है। धर्मों में विविधता का कारण यही है। 

बुद्धि कहती है कि ईश्वर और परलोक की बात करने वालों पर विश्वास किया जाए, क्योंकि अविश्वास की स्थिति में यदि उनकी बातें सही हुईं तो बहुत बड़ी हानि होगी।

Sunday, 10 February 2013

खुशियाँ ढूँढने से नहीं मिलती हैं, खुशियाँ खुद को पा लेने से मिलती हैं।।




यूं ही राह में चलते चलते,
एक रोज़, एक ऐसी दुनिया देखी मैंने।
जो चम-चमाती हुई जुगनू सी लग रही थी,
जहाँ प्यार भरे हसते चेहरे देखे मैंने।।
एक उम्मीद की किरण देखी, 
एक तरंग सी जागी मन में।
फिर जीने की चाह जागी,
फिर खुशिया आई जीवन में।।

में भूल गया अपनी उस दुनिया को,
रंग गया इस नयी दुनिया में।
मदहोश हो चूका था में,
स्वर्ग की सुन्दरता सा लगता है।
अब यहीं बस जाने को मन करता है,
यहीं खो जाने को मन करता है।।

अब फिर जीने को मन करता है,
दिन गए, महीने बीते।
तब जाना मैंने,
जो लोग बसते हैं यहाँ पर,
 वो मेरी उस दुनिया के ही लगते हैं।
जो प्यार और खुशियाँ बट रही हैं यहाँ,
वो उस दुनिया में भी बट सकती हैं।

जिसने इस दुनिया को स्वर्ग बनाया है,
वो उस दुनिया को भी स्वर्ग सा सुन्दर क्यों नहीं बनाते।।
क्यों छोड़ आये सब उस दुनिया को,
जब अपनी ही दुनिया में सब मिलता है।
क्यों चले आये एक नयी दुनिया बसाने को।।

अब वो दुनिया बेरहम और खुदगर्ज़ सी नहीं लगती है।
अब कोई दर्द, कोई मायूसी नहीं लगती है।।
जान गया हूँ में, खेल इस दिल के,
खुशियाँ हर दुनिया में होती हैं।
खुशियाँ ढूँढने से नहीं मिलती हैं,
खुशियाँ खुद को पा लेने से मिलती हैं।।

$

Saturday, 26 January 2013

हमारा गणतंत्र- न गण है न तंत्र

लोक का स्थान स्वयं ने ले लिया और तंत्र का स्थान परिवादवाद ने, बची-खुची कसर जातिवाद के तंत्र ने कर दी। बढ़ते लम्पट तंत्र एवं गिरते राजनीतिक तंत्र से कहीं न कहीं नुकसान गणतंत्र को अवश्य ही हुआ है। गुलाम भारत को स्वतंत्र कराने में जिन नेताओं ने अपनी जवानी न्यौछावर कर दी उन्हें आज के तथाकथित लोकतंत्र से ज्यादा पीड़ा है, और हो भी क्यों न ?




आज के नेता लोकतंत्र के नाम पर जो कुछ कर रहे हैं वह केवल शर्मशार ही करने वाला है, फिर बात चाहे भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने की हो, खूंखार अपराधियों जिन पर दर्जनों केस चल रहे है, बलात्कारी है, को अपना उम्मीदवार बना गणतंत्र के मंदिर में पहुंचाने का कुत्सित प्रयास ही किसी देशद्रोह से कम नहीं है। भारत की आजादी में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेने वाली, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की सेना में सम्मिलित ‘‘लोह महिला’’ के रूप में प्रख्यात केप्टन डॉ. लक्ष्मी सहगल आज के लोकतंत्र को देख दुखी है वो कहती है कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने ऐसे लोकतंत्र का सपना तो कम से कम नहीं देखा था। इसमें बदलाव आना ही चाहिए, चुनाव में प्रत्याशी ऐसे खड़े हो जो जनता के भले की सोचे, शहर के विकास की सोचे न कि अपने और अपने परिवार के विकास के लिए।
हमें देश की आजादी पर गर्व होना चाहिए क्योंकि यह आजादी बहुत कुर्बानियों के बाद मिली है। इसे केवल निःस्वार्थ की भावनाओं से ही संभाला जा सकता है। वर्तमान राजनीति पर कहती है कि आज के नेता भ्रष्ट से भ्रष्टतम होते जा रहे है ऐसे चुनावों से कोई करिश्मा नहीं हो सकता। सच्चे देशभक्त युवाओं से ‘‘लोह महिला’’ को काफी उम्मीदें है। समाजसेवी मेघा पाटकर भी कुछ ऐसी ही राय वर्तमान राजनीति को लेकर रखती है। यह सच्चा लोकतंत्र नहीं है और न ही इसकी नीतियों में लोकतांत्रिक मूल्यों की सुगंध आती है।

महात्मा गांधी, वल्लभ भाई पटेल, जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, डॉ. राधा कृष्णन, डॉ. बाबा भीमराव अम्बेडकर ने जिस गणतंत्र की बात की थी। आज तो कम से कम दूर-दूर तक नहीं दिख रहा है। जिस आदर के साथ स्वतंत्रता के बाद की पीढ़ी इनका नाम लेती है। वर्तमान परिदृश्य में आज ऐसा एक भी नेता नहीं है जिसे युवा पीढ़ी अपना आदर्श माने। जैसा कृत्य ये नेता करेंगे युवा उसी का अनुशरण करेंगे फिर युवाओं को दोष क्यों?
पांच राज्यों में चुनाव अपने पूरे शवाब पर है और ऐसे में नेता जाति, धर्म का उपयोग संविधान विरूद्ध बढ़-चढ़कर कर रहे है। ये यही नही रूकते, एक कदम आगे बढ़ सभी पार्टियों ने भ्रष्टाचारियों, बलात्कारियों, अपराधियों को अपने दलों में न केवल आदरपूर्वक जगह देते है बल्कि उनके गुणगान में संविधान में वर्णित आदर्शों को भी धता बता कह रहे है‘‘ ‘‘दर्जनों केस ही तो चल रहे है अपराध तो सिद्ध नहीं हुआ।’’ यह नियमों की निकृष्ट व्याख्या है। ‘‘क्या अपराधी और आदतन अपराधी में भेद करने की हमारे नेताओं की बुद्धि भी कुंठित हो गई है।’’
राजनीतिक पार्टियों के नेताओं के बयानवीरों, आश्वासनवीरों को तो देखिए कोई कम्प्यूटर फ्री देने की बात करता है तो कोई बिजली ऋणमाफी, आरक्षण की बात करता है। कोई इन भले मानुषों से यह तो पूछे क्या ये पैसा आपके बाप का है? जो ऊल-जलूल घोषणाएं किये जा रहे हो। निःसंदेह पैसा आम जनता का है, जनता से ही टेक्स वसूलेंगे। अन्ततः जनता ही महंगाई की बलि की बेदी पर चढ़ेगी।
हकीकत में ‘‘फ्री’’ शब्द ही असंवैधानिक है ऐसा कर हम कहीं न कहीं किसी के साथ धोखा दे रहे होते है। नेता जनता को बेवकूफ बनाने के नित नए फार्मूले ईजाद कर रहे है। नेताओं को भी अपनी जीत के लिए जनता की भावनाओं से खेलने का घिनोना खेल बंद कर सच्ची सेवा की बात करना चाहिए। जनता को इसमें कोई भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि जैसे ही पांचों राज्यों के चुनाव सम्पन्न होंगे दूसरे ही दिन पेट्रोल/डीजल की कीमतों में भारी वृद्धि कर दी जायेगी और फिर जनता को हमेशा की तरह कराहने के लिए, बिलखने के लिए उन्हें उन्हीं के हाल पर छोड़ दिया जायेगा? नाटक के लिए कुछ विपक्षीगण रैली निकाल अपनी राजनीति को चमकायेंगे।
हाल ही में जो नारी शक्ति की रक्षा के लिए जो देशभर के लोगो ने एकता का परिचय दिया वो सराहनीय था , और इसी एकता के दम पर हम गण इस तंत्र को हिल सकते हैं, तो आपस में शुभकामनाये देने की जगह वही विरोध हमारे चेहरे पर दिखना चाहिए इस तंत्र के लिए, वरना थोड़े दिन में सब भूली-बिसरी बातें बन कर रह जाती है और इस तंत्र का दुष्प्रयोग करने वाले चैन से जनता को लूटते रहते हैं।।
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