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Friday, 23 November 2012

सड़कों पर रहते हैं पर “आवारा” नहीं है



आपने सड़कों और रेल पटरीयों पर घूमते और सोते बच्चों को तो जरूर देखा होगा. यह वो बच्चे हैं जो या तो बचपन में ही माता-पिता से अलग हो जाते हैं या फिर किसी खुद ही घर से भाग कर आ जाते हैं. अनाथ और बेसहारा ऐसे बच्चों का इस दुनियां में कोई नहीं होता. अगर वह किसी से बात कर सकते हैं या फिर किसी के साथ खेल सकते हैं तो बस अपने जैसे अन्य स्ट्रीट चाइल्ड्स से. जी हां, जिन बच्चों को हमारा सभ्य समाज स्ट्रीट चाइल्ड की संज्ञा देता है असल में वे भी हम और जैसे ही हैं. फर्क बस इतना है कि उनके पास “अपना” कहने वाला कोई नहीं है.
 वैसे इस क्षेत्र में वह बच्चे भी आते हैं जो 14 वर्ष से कम हैं और बसों और रेल आदि में छोटे-छोटे सामान बेच कर आजीविकार्जन करते हैं. देखने में तो यह बच्चे बहुत खुश लगते हैं लेकिन जैसे-जैसे हमारा जमीनी हकीकत से सामना होता है तब समझ में आता है कि उनके चेहरे की खुशी के पीछे कभी ना मिटने वाला एक गहरा दर्द छिपा है. उल्लेखनीय तथ्य यह भी है कि पहले से ही अकेलेपन से जूझ रहे इन बच्चों का मानसिक और शारीरिक दोनों ही तरह शोषण भी किया जाता है.



सडकों पर रहने वाले बच्चे एक ओर जहां दिन भर सूरज की गर्मी में रहते हैं वहीं रात का अंधेरा गुनाह की रोशनी लेकर आता है. यह बच्चे तो सोते हुए भी सुरक्षित नहीं रहते. रेल की पटरियों पर रहने वाले बच्चों को आप हमेशा सस्ते नशे में डूबे पाएंगे और यह शारीरिक शोषण के सबसे ज्यादा शिकार होते हैं. कुछ ऐसा ही हाल बसों या रेल आदि में घूमने वाले बच्चों का होता है.

इस दुर्दशा के पीछे जितना जिम्मेदार माता-पिता की बेपरवाही है, उतना ही सरकार का ढुलमुल रवैया भी है. कुछ अभिभावक बच्चों की वह देखभाल नहीं कर पाते जो करनी चाहिए तो कुछ उन्हें भगवान भरोसे ही छोड देते हैं. कुछ बच्चे अच्छे भविष्य की चाह में घर से भाग जाते हैं और बाद में उन्हें ऐसी जिन्दगी मिलती है जो इन्हें एक बुरे सपने की याद दिला देता है.

लेकिन अब सवाल उठता है कि क्या हमारी सरकारों को इस देश की सबसे बड़ी धरोहर का कुछ ख्याल है?

स्ट्रीट चाइल्ड के उद्धार लिए क्या किया गया
कानून की बात करें तो इसकी किताब में इनके अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए कई कानून हैं. लेकिन वास्तविक स्थिति यह है कि भारत में कानून सिर्फ नाम के ही होते हैं जिन्हें कभी भी तोड़ा जा सकता है.

26 दिसम्बर 2006 को चर्चा में आए निठारी कांड की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इतिहास का सबसे तीखा बयान देते हुए देश की कानून व्यवस्था को बच्चों के प्रति सचेत रहने को कहा, साथ ही उसने ऐसे सभी कानूनों और प्रस्तावों को सख्ती से लागू करने का निर्देश दिया जो आवारा या बेसहारा बच्चों की मदद कर सकते थे.

एकीकृत बाल संरक्षण स्कीम (आईसीपीएस)

इस स्कीम के अंतर्गत बच्चों की सुरक्षा का ख्याल रखा गया है. इस व्यापक योजना में आपात-कालीन आउटरीच (अपने कार्यक्षेत्र से बाहर जाकर) सेवाएं, आश्रय, पालन-पोषण, विशेष आवास, खोए और बिछुड़े बच्चों हेतु वेबसाइट और अन्य अनेक नवाचारी हस्तक्षेप सहित बच्चों को सहायता पहुंचायी जाती है.

इस स्कीम का उद्देश्य योजना कठिन परिस्थितियों में रह रहे बच्चों की देखभाल में सुधार लाने के साथ-साथ उन कार्यों और स्थितियों से जुड़े जोखिमों को कम करना है जो बच्चों के साथ गलत व्यवहार, तिरस्कार, शोषण, उपेक्षा और अलगाव को बढ़ावा देते हैं.

समन्वित बाल विकास सेवा योजना
यह पूरे देश में या यों कहे विश्वाभर में, बाल विकास के संबंध में, अत्यकधिक व्यांपक योजनाओं में से एक है. बच्चों के संबंध में राष्ट्रीय नीति के अनुसरण में महिला व बाल विकास मंत्रालय द्वारा इस योजना को 1975 से चलाया जा रहा है. इसका उद्देश्यस स्कूाल जाने से पहले बच्चों के लिए एकीकृत रूप से सेवाएं उपलब्धा कराना है, ताकि ग्रामीण, आदिवासी और झुग्गी वाले क्षेत्रों में बच्चों की उचित वृद्धि और विकास सुनिश्चिरत किया जा सके. इस केन्द्र प्रायोजित योजना द्वारा बच्चों के पोषण की निगरानी की जाती है.

जिस अंदाज में गैर सरकारी संस्थानों ने बच्चों की मदद की है उससे यह साफ हो गया है कि स्ट्रीट चाइल्ड या आवारा बच्चों की मदद करने के लिए बिलकुल निम्नतम स्तर पर जाना होगा तभी कुछ संभव है वरना सरकार के नुमाइंदे तो बाहर ही देखते रहेंगे और इन बच्चों का भला नहीं हो पाएगा.

अगर अब हम नहीं चेते तो वह दिन दूर नहीं जब यही आवारा बच्चे अपने ही समाज के लिए खतरा बन जाएंगे क्योंकि यह तो हम जानते ही हैं कि बच्चे उस कोमल पंख की तरह होते हैं जो हवा के साथ बह जाते हैं. जिस तरफ हवा होगी उसी ओर यह बच्चे बह चलेंगे.


13 comments:

  1. पूनम महेश्वरीFriday, November 23, 2012 4:42:00 pm

    यह ऐसा विषय है जिसे लोग सिर्फ अपनी नेतागिरी चलाने के लिए उपयोग करते हैं. जहांतक बात है गैरसरकारी तत्वों की तो कई मामलों में उन्हें भी बच्चों का गलत पयोग करते पकडा गया है. ऐसे में कैसे कोई माने की इन स्ट्रीट चाइल्ड का भविष्य उजाले की तरफ जा स्कता है. मेरी राय में तो इस मसले में सरकार को गैर सरकारी संस्थानों के साथ मिलकर काम करना चाहिए तभी कोई हल निकल सकता है अन्यथा ऐसा हो सकता है कि कही ये गैर सरकारी संस्थान ही बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड न शुरु कर दें.

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  2. अल्फिया रशीदSunday, November 25, 2012 1:25:00 pm

    Shayad apne maa-baap ki berozgaari ya makkari ka shikaar bante hain ye bachche.
    bachcho ke liye to trusts aage aa bhi jaye, par inki wajah in bachcho ke mentors ko kaun dekhega sumit.

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  3. Bilkul sahi kaha aapne
    sansthaye to baad me hain
    pehle to in bachcho ke samne hum or hamara samaaj hai

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  4. sir first society is most important of child..kyoki samaj he ye sb krwata hai aur dusri goverment jo dekh kr b kuch nai krti bt wo sb kuch kr skti hai mai toh yehi kahunga society aur goverment dono he jimmedar hai

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  8. आपके द्वारा इस आर्टिकल में देश की एक ऐसी सचाई को बताया है जिस पर ध्‍यान नही दिया जायेगा तो ऐसे बच्‍चों का भविष्‍य अन्‍धकार मय हो जाएगा। हमारे देश की सरकार को इन बच्‍चों पर ध्‍यान देना चाहिए जिससे इन बच्‍चों का भी भविष्‍य अच्‍छा हो सके।

    Mohit Mishra(http://www.allinhindi.com)

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