हमें इ-मेल द्वारा फोल्लोव करें! और हज़ारो लोगो की तरह आप भी इस ब्लॉग को सीधे इ-मेल द्वारा पढ़े!

Friday, 30 December 2011

मैं तो पढ़-लिख गयी सहेली..







दोस्तों, काफी दिनों से एक दिली इच्छा थी की अपनी ये पंक्तियाँ आप सब के बीच शेयर करू....
और देखिये
आखिर आज साल के आखिरी दिन हमें ये मौका मिल ही गया...!
:)
आप सभी के विचार संग्रहणीय होंगे... 




मैं तो पढ़-लिख गयी सहेली..

खेल न पायी बचपन में,
झिड़की-तानो से खेली!
खूब सताया
निबल बताया,
कितनी आफत झेली!


समझ न पाए
नारी का मन
बस कह दिया पहेली!
अब मेरे घर भी पढ़े
जमीलो, फूलो और चमेली!
मैं तो पढ़-लिख गयी सहेली..


हमको कभी न
मानुस समझा,
समझा गुड़ की भेली!
चीज़ सजाने की माना,
दमका ली महल-हवेली!

बचपन से ही बोझ कहा,
सारी आज़ादी ले ली!
हाथ की रेखा
बदली मैंने,
देखो मेरी हथेली!
मैं तो पढ़-लिख गयी सहेली..


दुनिया भर की खबरे बांचे,
समझे सभी पहेली,
अब न दबेगी,
अब न सहेगी,
समझो नहीं अकेली!

ओ भारत के नए ज़माने,
तेरी नारी नवेली!
पढ़-लिख कर अब
नयी चेतना से
दमको अलबेली!
मैं तो पढ़-लिख गयी सहेली..
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...
My facebook ID:Sumit Tomar