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Wednesday, 14 September 2011

भारत के विश्वकर्मा : विशेश्वरैया

परतंत्र भारत में अपनी बौद्धिक योग्यता व यांत्रिक कुशलता के बल पर दुनिया भर में भारतीय प्रतिभा का डंका बजाने वाले मोक्षगुण्डम विशेश्वरैया जिनको 'भारतीय अभियांत्रिकी का जनक' माना जाता है, की जयंती 15 सितम्बर को प्रतिवर्ष 'इंजीनियर्स डे' के रूप में मनाया जाता है।
विशेश्वरैया द्वारा बनवाया गया कृष्णाराज सागर बांध तत्कालीन ब्रिाटिश भारत में बने जलाशयों में सबसे बड़ा है। इस बांध से एक लाख एकड़ से अधिक भूमि में सिंचाई का विस्तार हुआ, साथ ही मैसूर, बेंगलुरु व राज्य के कई गांवों व कस्बों में स्थापित कारखानों व घरेलू इस्तेमाल के लिए बिजली मिलने लगी। इसी परियोजना के तहत कावेरी नदी की बायीं ओर वाली नहर को एक पहाड़ी में पौने दो मील लम्बी एक सुरंग बनाकर उसमें से गुजारी गई। सिंचाई नहर की यह सुरंग भारत में सबसे लम्बी है। मैसूर के इंजीनियरिंग विभाग द्वारा तैयार की गयी रिपोर्ट के मुताबिक इस परियोजना पर लगभग 10 करोड़ रुपये खर्च हुए थे जबकि कुछ ही वर्षों बाद इससे जनता को 15 करोड़ का वार्षिक लाभ होने लगा। साथ ही राज्य को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष करों द्वारा एक करोड़ की अतिरिक्त आमदनी होने लगी।

महात्मा गांधी ने सार्वजनिक सभा में कहा था 'कृष्णाराज सागर बांध जो देश के प्रमुख जलाशयों में से एक है, विशेश्वरैया जी की कीर्ति बढ़ाने के लिए पर्याप्त है।' इसी तरह, पूना नगर के पास बहने वाली एक नहर में लेक फाइव झील का पानी गिरता। उस पर बांध बहुत पुराने ढंग से बना हुआ था जिसके चलते बहुत सा पानी बर्बाद हो जाता था और शहर में पानी की कमी बनी रहती थी। विशेश्वरैया ने  इस समस्या के निदान की एक नई विधि ढूंढ निकाली। झील की सतह ऊंची होने के कारण उसमें बरसात का पानी पूरा नहीं रुक पाता था। 
फलत: जब पानी बांध की चोटी से 7-8 पुट ऊपर चढ़ता तो बाहर निकल कर बहने लगता। झील की सतह को गहरा बनाना संभव नहीं था। इसलिए उन्होंने बांधों के लिए स्वचालित फाटकों की एक अभिनव योजना बनाई। बांध में कई ऐसे फाटक लगाये गये जो  पानी के ऊपर चढ़ने पर उसे 8 फुट की ऊंचाई तक रोके रखता मगर जब पानी इससे भी ऊपर चढ़ता तो ये फाटक खुद खुलकर फालतू पानी बाहर निकाल देते। इस योजना से झील के पानी की मात्रा 25 प्रतिशत बढ़ गयी और शहरवासियों के पानी के संकट की समस्या भी हल हो गयी।

शुरू में तो गोरे इंजीनियरों को विश्वास नहीं हुआ कि कोई भारतीय इंजीनियर भी ऐसा कर सकता है। बाद में ऐसे फाटक ग्वालियर व मैसूर के बांधों में भी लगाये गये तो अंग्रेज इंजीनियरों को भारतीय मस्तिष्क का लोहा मानना पड़ा। अदन (बंदरगाह जो ब्रिाटिश भारत के शासनाधिकार में ही था) में विशेश्वरैया ने सफाई व पेयजल के अलग-अलग नलों की ऐसी व्यवस्था की ब्रिाटिश अधिकारियों के मन में उनकी योग्यता व ईमानदारी का सिक्का जम गया।

इसी तरह, जब सक्खर (सिंधु) में वाटर वक्र्स बनाने में मुख्य कठिनाई थी कि सिंधु नदी के गंदे पानी की निकासी के लिए तीन टंकियों के निर्माण हेतु नगरपालिका के पास धन नहीं था। विशेश्वरैया ने नदी तट के समीप दो कुएं खोदकर उनका जल पम्प द्वारा वाटर वक्र्स के तालाब में भेजने की योजना बनाई। इस तरह काफी कम खर्च में नगर को पर्याप्त मात्रा में जल मिलने लगा। गवर्नर लार्ड सैण्डहस्ट ने एक शिलालेख लगाकर उनकी प्रशंसा की।

इस कार्य के उपरांत आपको पूना जिले की सिंचाई व्यवस्था में सुधार का दायित्व मिला। यह भूभाग बम्बई प्रांत में सिंचाई की दृष्टि से दूसरे नम्बर का समझा जाता था मगर नहरों के पानी के वितरण की उचित व्यस्था के अभाव में बहुत सा पानी बर्बाद हो जाता था। इसके लिए उन्होंने यह योजना बनायी कि प्रत्येक क्षेत्र के किसानों को बारी-बारी से 10 दिन तक पानी मिले। कई किसानों ने इसका विरोध किया। मगर विशेश्वरैया ने एक सभा में और एक बड़ी समस्या सहज ही सुलझ गई।

विशेश्वरैया बजट के अनुसार कार्य करने वाले देश के प्रथम अभियंता थे। 1930 में बम्बई विश्वविद्यालय ने उन्हें 'डॉक्टरेट' की मानद उपाधि से सम्मानित किया। ब्रिटिश सरकार ने भी उन्हें 'सर' की उपाधि और भारत के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद ने सर्वोच्च अलंकरण 'भारत रत्न' प्रदान किया। विशेश्वरैया के जीवनकाल में ही 1961 में उनकी जन्म सदी धूमधाम से मनाई गई। साल भर बाद 14 अप्रैल 1962 को उनका निधन हो गया।


आज इंजीनियर्स डे है
आज के दिन हमें देश के सभी इंजीनियर्स का सम्मान करना चाहिए
जिन्होंने इस देश की प्रगति में अपना बहुमूल्य योगदान दिया है
देश के सभी इंजीनियर्स आज अपने आप को गोरवान्वित महसूस करें
चाहे जितना भी हो
उनका भी योगदान कहीं न कहीं किसी बड़े कार्य को पूरा करने में
शामिल है


इंजीनियर्स डे पर सभी को शुभकामनाएं..

Monday, 5 September 2011

शिक्षक दिवस: क्या शिक्षा के ज़रिए अज्ञान का अंधकार दूर ना कर पाने का भयानक अपराध ‘शिक्षकों’ के मथ्थे नहीं मढ़ा जाना चाहिए

 आज शिक्षक दिवस है। सारे अखबार या तो शिक्षकों की बदहाली अथवा प्रशंसा से भरे हुए हैं। अच्छी बात है, जो शिक्षक हमें एक सफल सामाजिक प्राणी बनाने के लिए अपनी रचनात्मक भूमिका निभाकर एक महान कार्य करता है, उसके प्रति कृतज्ञता का भाव प्रदर्शित करना एक सुशिक्षित व्यक्ति के लिए लाज़मी है और दूसरी और इस महती सामाजिक कार्य की जिम्मेदारी उठाने वाली महत्वपूर्ण इकाई के प्रति सरकार के असंवेदनशील रुख की भर्त्सना करना भी उतना ही ज़रूरी है।
    सरकार का शिक्षकों को दोयम दर्ज़े के सरकारी कर्मचारी की तरह ट्रीट करना, उनके वेतन, भत्तों, सुख-सुविधाओं के प्रति दुर्लक्ष्य करना, उन्हें जनगणना, पल्स पोलियों, चुनाव आदि-आदि कार्यों में उलझाकर शिक्षा के महत्वपूर्ण कार्य से विमुख करना, इनके अलावा और भी कुछ ऐसे मुद्दे हैं जो एक शिक्षक की भूमिका और महत्व को सिरे से खारिज करते से लगते हैं। लेकिन, इस सबसे परे, शिक्षकों की अपनी कमज़ोरियों, अज्ञान, कुज्ञान, अवैज्ञानिक चिंतन पद्धति, भ्रामक एवं असत्य धारणाओं के वाहक के रूप में समाज में सक्रिय गतिशीलता के कारण आम तौर पर मानव समाज का और खास तौर पर भारतीय समाज का कितना नुकसान हो रहा है, यह हमारे लिए बड़ी चिंता का विषय है।
  
  पिछले दो-तीन सौ साल मानव सभ्यता के करोड़ों वर्षों के इतिहास में, विज्ञान के विकास की स्वर्णिम समयावधि रही है। इस अवधि में प्रकृति, विश्व ब्रम्हांड एवं मानव समाज के अधिकांश रहस्यों पर से पर्दा उठाकर सभ्यता ने व्यापक क्रांतिकारी करवटें ली हैं। एक अतिप्राकृतिक सत्ता की अनुपस्थिति का दर्शन भी इसी युग में आविर्भूत हुआ है जिसकी परिणति दुनिया भर में मध्ययुगीन सामंती समाज के खात्में के रूप में हुई थी जिसका अस्तित्व ही ईश्वरीय सत्ता की अवास्तविक अवधारणा पर टिका हुआ था।
    भारतीय समाज में सामंती समाज की अवधारणाओं, मूल्यों का पूरी तौर पर पतन आज तक नहीं हो सका है और ना ही वैज्ञानिक अवधारणाओं की समझदारी, आधुनिक चिंतन, विचारधारा का व्यापक प्रसार ही हो सका है। बड़े आश्चर्य की बात है कि जिस समाज में ’सत्य-सत्य‘ का डोंड सामंती समय से ही पीटा जाता रहा हो उस समाज में ’सत्य‘ सबसे ज़्यादा उपेक्षित रहा है।
   
 हमें आज़ाद हुए 64 वर्ष से ज़्यादा हो गए, देश आज भी सामंत युगीय अज्ञान एवं कूपमंडूकता की गहरी खाई में पड़ा हुआ है। धर्म एवं भारतीय संस्कृति के नाम अवैज्ञानिक क्रियाकलापों कर्मकांडों का ज़बरदस्त बोलबाला हमारे देश में देखा जा सकता है। 
क्या शिक्षक का यह कर्त्तव्य नहीं था कि वह ’सत्यानुसंधान‘ के अत्यावश्यक रास्ते पर चलते हुए भारतीय समाज को इस अंधे कुएँ से बाहर निकालें ?
 क्या ’धर्म‘ की सत्ता को सिरे से ध्वस्त कर स्वतंत्रता, समानता, भाईचारे की संस्कृति को रोपने, वैज्ञानिक चिंतन पद्धति के आधार पर भारतीय समाज का पुनर्गठन करने की जिम्मेदारी ’शिक्षकों‘ की नहीं थी ? 
क्या शिक्षा के ज़रिए अज्ञान का अंधकार दूर ना कर पाने का भयानक अपराध ’शिक्षकों‘ के मथ्थे नहीं मढ़ा जाना चाहिए जिसने हमारे देश को सदियों पीछे रख छोड़ा है ? 
क्या मध्ययुगीन अवधारणाओं के दम पर विश्व गुरू होने का फालतू दंभ चूर चूर कर, वास्तव में ज्ञान की वह ’सरिता‘ प्रवाहित करना एक अत्यावश्यक ऐतिहासिक कार्य नहीं था जिसके ना हो सकने का अपराध किसी और के सिर पर नहीं प्रथमतः शिक्षकों के ही सिर पर है।
    
अब भी समय है, प्रकृति मानव समाज एवं विश्व ब्रम्हांड के सत्य को गहराई में जाकर समझने और एकीकृत ज्ञान के आधार पर भारतीय समाज में व्याप्त अंधकार को दूर करने की लिए प्रत्येक शिक्षक आज भी अपनी भूमिका का निर्वाह कर सकता है, बशर्ते वह अपने तईं ना केवल ईमानदार हो बल्कि सत्य के लिए प्राण तक तजने को तैयार हो।
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